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________________ नमस्कार मंत्र स्मरण अर्थात् अमरकुमार वृत्तान्त ११५ होता देखता रहे, दु:ख के समय सहायता करने वाले तथाकथित स्वजन अपनी आँखों से अपने स्वजन को वधस्थान पर ले जाते हुए देखते रहें और प्रजापालक गिना जाने वाला राजा अपने हाथों निर्दोष सुकोमल बालक का वध होने दे, फिर भी वे मातापिता, स्वजन एव प्रजा-पालक राजा कहलायें, यह जगत का न्याय है' - पुरोहित के रसमक्ष मुँह करके अमरकुमार ने कहा। 'पुरोहितजी महाराज! क्या आपके शास्त्र मेरे समान निर्दोष वालक के बलिदान से ही द्वार नहीं गिरने का कह रहे हैं? पुरोहितजी! मेरे आँसू एवं निःश्वास द्वार को स्थायित्व प्रदान करेंगे अथवा रही सही चित्रशाला एवं आप सबको धराशयी कर देंगे, इसका विचार करो।' पुरोहितजी मुस्कुराये और सेवकों को आदेश दिया, 'अव विलम्व मत करो, मृत्यु कौन चाहता है?' आदेश पाते ही सेवकों ने अमरकुमार को स्नान कराया, पीताम्बर पहनाया, उसके गले में कनेर के पुष्पों की मालाएँ पहनाईं और यज्ञ-वेदी के सामने खड़ा कर दिया। तत्पश्चात् पुरोहितजी अधमूंदे नेत्रों की मुद्रा में वेदों के मन्त्रोच्चार करने लगे। (३) घड़ी भर पूर्व माता, पिता, महाजनों एवं प्रजाजनों, राजा और पुरोहित के समक्ष अनुनय-विनय करने वाले अमरकुमार के नेत्रों में से दीनता अदृश्य हो गई, उसके होंठ भिंच गये, नेत्र मूंद गये और जब उसने मन में विचार करते हुए सम्पूर्ण जगत् पर दृष्टि डाली तो उसे माता, पिता, परिवार सव स्वार्थी प्रतीत हुए । केवल एक ही महापुरुष की आकृति उसके समक्ष खड़ी हो गई और वह थी एक मुनि की आकृति । एक वार उसका एक अणगार साधु से मिलाप हुआ था और उन्होंने उसे कहा था कि 'अमर! समस्त कष्टों का नाश एवं निवारण करने वाला ‘महामंत्र नवकार' का स्मरण है।' मुझ पामर ने नित्य उसका स्मरण नहीं, किया ध्यान नहीं किया, आज में उसका ध्यान धरूँगा और उसकी शरण में जाऊँगा। अमरकुमार ने सबको अपने चित्त से हटा दिया और 'नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं....' पदों का उच्चारण करता हुआ उसके ध्यान में लीन हो गया और इधर पुरोहितजी के सेवकों ने वलिदान के लिए अमरकुमार को अग्नि की धधकती ज्वालाओं में फेंक दिया, परन्तु दूर-दूर खड़े व्यक्ति को पसीना (प्रस्वेद) एवं उष्णता प्रदान करती वे ज्वालाएँ अमरकुमार को शीतल प्रतीत हुईं और उनमें वह किसी राज्य-सिंहासन पर बैठा हो उस प्रकार दृष्टिगोचर हुआ । सामने की ओर अमरकुमार ने दृष्टि डाली तो राजा को रक्त का वमन हो रहा था । पुरोहितजी एवं उनके सेवक उल्टे सिर सुखी लकड़ी की तरह निश्चेष्ट होकर वेस्ध
SR No.008714
Book TitleJain Katha Sagar Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKailassagarsuri
PublisherArunoday Foundation
Publication Year
Total Pages164
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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