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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org ९२४ श्री सहस्रकूट जिनप्रतिमा स्तवन. तीर्थ सकल वळी तीर्थंकर सहु, एणे पूजा ते पूजाय विवेकी; एक जीह (जीव्हा) यी महिमा एहनो, किणभातें कहेवाय. वि० १० ॥ श्रीमाळी कुळदीपक जेतसी, शेठ सुगुणभंडार विवेकी; तस सुत शेठ शिरोमणि तेजसी, पाटण नगर में दातार. वि० ११॥ तेणें ए वित्र भराव्या भावशुं सहस अधिका चोवीस विवेकी; कीधी प्रतीष्ठा पुनमगच्छचक, भावप्रभसरीस. वि० १२ ॥ सहस जिनेसर विधीशुं पूजसे, द्रव्यभाव शुचि होय विवेकी; ए भव परभव परम सुखी होवे, लहस्यें नवनिधि सोय. वि० १३ ॥ जिनवर भक्ति करें मनरंगरी, भविजननी ए छे रीत विवेकी; दीपचंद्र सम श्री जिनराजजी, देवचंद्रनी ए प्रीत वि० ॥ १४॥ इति सहस्रकूट स्तवन समाप्त ॥ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ॥ पद ॥ राग होरी ॥ अजितनाथ चरण तोरे || आयो अ० ॥ तुं मनमोहन नाथ हमारो, त्रिभुवनजनकुं सुख प्यारो ॥ अरी अरी लाला त्रि० ॥ तृष्णा ताप निवारण वारो, बावना चंदनसें अति प्यारो ॥ अ० ॥ १ ॥ माहा माहांग रक्तंग करीरो, तस भेदनकुं वज्र अटारो || अ० ॥ प्रांगधरा पुरमां मनोहारो, प्रासाद बन्यो अतिसारो || अ० ||२|| समता रस वरषित घन धारो, समकित बीज ऊपावत क्यारो ॥ अ० देवचंद्र गुणि गुण संभारो, एही अशरण शरणता ऊदारो ॥ अ० ॥ ३ ॥ 32 For Private And Personal Use Only
SR No.008662
Book TitleShrimad Devchandra Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhisagar
PublisherAdhyatma Gyan Prasarak Mandal
Publication Year
Total Pages670
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Worship
File Size9 MB
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