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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ११४ सुख दुःख पोताना सम अन्यने जाणीने; सर्व जीवोने पोताना सम देखजो. आत्मोन्नति. ६ सत्योद्धारक धर्मोद्धारक कार्यमां; । उद्यम करवो मनमां धरीने व्हालजो, चेतनशक्ति जाणी चेतन सेववो; सत्य जूठनो करशो मनमा ख्यालजो. आत्मोन्नति. ७ प्राणांते पण परनी निन्दा त्यागवी; धर्मिजनने करवी प्रेमे स्हायजो, क्रोध मान माया ने लोभ नीवारता; बुद्धिसागर वर्तनथी सुख थायजो. आत्मोन्नति. ८ नीतिपद. ओधवजी सन्देशो कहेशो श्यामने-ए राग. हळीमळीने चालो सहुनी साथमां, व्हालां साथे कदी न करवू वेरजो; मातपितानी शिक्षा हृदये धारवी, जीवोनी साथे कर नहि झेरजो. हळीमळीने. ॥ १ ॥ संकट पडतां हिंमत हृदये धारवी, कदी न करवो दुर्जन साथे प्यारजो; देश वेषथी विरुद्धवर्तन त्याग, वात चित्तमां कदी न करवो खारजो. हळी. ।। २ ॥ साधुजननी सेवा साची साचवो, सत्ता धनथी करो नहीं अहंकारजो; परोपकारे प्रीति निशदिन राखवी, दया धर्मने सेवो शिव सुखकारजो. हळी. ॥ ३ ।। For Private And Personal Use Only
SR No.008537
Book TitleBhajanpad Sangraha Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhisagar
PublisherAdhyatma Gyan Prasarak Mandal
Publication Year1908
Total Pages330
LanguageGujarati, Sanskrit
ClassificationBook_Gujarati & Worship
File Size13 MB
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