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________________ 168... प्रतिष्ठा विधि का मौलिक विवेचन 50. वही, 3/68 51. वास्तु विद्या, अधिकार छटवाँ 52. शुचीमुखं भवेत्छीद्रं, पृष्ठे यदा करोति च । प्रासादे न भवेत् पूजा, गृहे क्रीडन्ति राक्षसाः । शिल्प दीपक, 4/30 53. गूढ़स्त्रिकस्तथा नृत्यः, क्रमेण मण्डपास्त्रयः । जिनस्याग्रे प्रकर्त्तव्याः, सर्वेषां तु बलाणकम् ।। प्रासादमंडन, 7/3 54. प्रासादमंडन, 3/56 55. बलाणं देवगेहाग्रे, राजद्वारे गृहे पुरे। जलाश्रयेऽथ कर्त्तव्यं, सर्वेषां मुखमण्डपम् ।। प्रासाद मंडन, 7/38 56. वही, 7/43-46 57. वही, 7/47 58. प्रासाद मंडन, अध्याय चौथा 59. वेदी चतुर्विधा तत्र, चतुरस्रा च पद्मिनी । श्री धरी सर्वतो भद्रा, दीक्षासु स्थापनादिषु । चतुरस्रा चतु:कोणा, वेदी सौख्य फलप्रदा। केचिच्चैत्य प्रतिष्ठायां, पद्मिनी पद्मसंनिभा ॥ जयसेन प्रतिष्ठापाठ, श्लो. 228-229 60. प्रासादमंडन, पांचवाँ अध्याय 61. केसरी सर्वतो भद्रो, नन्दनो नन्दशालिकः । नन्दीशो मन्दरश्चैव, श्री वृक्षश्चामृतोद्भवः ।। हिमवान् हेमकूटश्च, कैलासः पृथिवीजयः । इन्द्रनीलो महानीलो, भूधरो रत्न कूटकः ।। वैडूर्यः पद्मरागश्च, वज्रको मुकुटोज्ज्वलः। ऐरावतो राजहंसो, गरुडो वृषभध्वजः ॥ (क) प्रासाद मंडन, 6/1-3 (ख) शिल्प रत्नाकर, 6/5-8
SR No.006251
Book TitlePratishtha Vidhi Ka Maulik Vivechan Adhunik Sandarbh Me
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSaumyagunashreeji
PublisherPrachya Vidyapith
Publication Year2014
Total Pages752
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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