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________________ प्रतिष्ठा सम्बन्धी आवश्यक पक्षों का मूल्यपरक विश्लेषण ...43 हैं लेकिन प्रतिष्ठा के नाम से कोई क्रिया नहीं होती है। राजभवन और दुर्ग आदि का नव निर्माण कल्पना मात्र रह गया है। चतुर्निकाय-भवनपति, व्यन्तर, ज्योतिष आदि देवों के नाम से पृथक प्रतिष्ठा होती हो, ऐसा प्रचलित व्यवहार में नहीं है। फिलहाल तो घण्टाकर्ण, मणिभद्र, भैरूजी, भोमियाजी आदि देवों की प्रतिष्ठा ही देखी जाती है। जलाशय एवं वृक्ष स्थानों को पूजनीक और देवाधिष्ठित अवश्य मानते हैं किन्तु इन स्थानों का प्रतिष्ठा संस्कार किया जाता हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। इस प्रकार आचार दिनकर द्वारा मान्य सभी वस्तुओं की प्रतिष्ठा शाश्वत नहीं है काल क्रम के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। किन्तु जिनबिम्ब, कलश, ध्वजा, परिकर, चैत्य, मंत्रपट्ट आदि की प्रतिष्ठाएँ प्रत्येक काल में विद्यमान रहती हैं।12 किस प्रतिष्ठा में किनका अन्तर्भाव यह जानने योग्य है कि जिनबिम्ब आदि की प्रतिष्ठा में अवान्तर रूप से किनका समावेश किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि • जिनबिम्ब प्रतिष्ठा में पाषाण, काष्ठ, हाथी दाँत, धातु एवं लेप्य (मिट्टी, चूने आदि का घोल तैयार कर उससे) निर्मित प्रतिमाओं का समावेश होता है। • चैत्य प्रतिष्ठा में महाचैत्य, देवकुलिका, मण्डप, मण्डपिका, कोष्ठ आदि की प्रतिष्ठा सम्मिलित होती है। • कलश प्रतिष्ठा में स्वर्ण एवं मिट्टी के कलशों की प्रतिष्ठा माननी चाहिए। . ध्वज प्रतिष्ठा में महाध्वजराज, ध्वजा, पताका आदि का अन्तर्भाव होता है। . • बिम्ब परिकर की प्रतिष्ठा में जल, पट्टासन, तोरण आदि की प्रतिष्ठा अन्तर्निहित है। • देवी प्रतिष्ठा विधि में अम्बिका आदि सर्व देवियों, गच्छ देवता, शासन देवता, कुल देवता आदि का सन्निवेश होता है। • क्षेत्रपाल की प्रतिष्ठा में नगर में पूजे जाने वाले एवं देश में पूजे जाने वाले बटुकनाथ, हनुमान, नृसिंह आदि का समावेश होता है। • गणेश आदि देवों की प्रतिष्ठा में मानू, धनादि की प्रतिष्ठा भी समाहित है।
SR No.006251
Book TitlePratishtha Vidhi Ka Maulik Vivechan Adhunik Sandarbh Me
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSaumyagunashreeji
PublisherPrachya Vidyapith
Publication Year2014
Total Pages752
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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