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________________ * तिर्यचोंका जघन्यमान और उपपात, च्यवनविरहकाल * .14.. जलचर . मत्स्योंका भी एक हजार योजनका देहमान होता है / [ यहाँ जलचर भी पूर्ण हुए। ] / / 297 // विशेषार्थ- सुगम है / [297] अवतरण-उसी खेचरके बारेमें कहकर सर्वका जघन्यमान कहते हैं। पक्खिदुगधणुपुहत्तं, सव्वाणंगुलअसंखभाग लहू- // 2973 // गाथार्थ-खेचरमें हंस, तोते, चमगादड आदि प्रकार के संमूच्छिम तथा गर्भज पक्षियोंका धनुष पृथक्त्व [ २से 9 ध० ] का देहमान है। [ इति तिरश्चामुत्कृष्टावगाहना ] एकेन्द्रियसे लेकर यावत् पंचेन्द्रिय तकके सर्व तिर्यचोंकी अवगाहना [ उपपातसमयाश्रयी ] जघन्यसे अंगुलके असंख्यातवें भागकी जानें / // 2973 // विशेषार्थ-वैक्रिय शरीरकी लब्धिवाले तिर्यच जीवों दो हैं / एक पर्याप्तबादर वायुकाय और दूसरा पर्याप्ता संख्यातावर्षायुषी गर्भज पंचेन्द्रिय / इनमें तथाविधि लब्धिप्रत्ययिक वैक्रियशरीरी वायुकायकी अवगाहना जघन्योत्कृष्ट दोनों प्रकारसे, अंगुलके असंख्यातवें भागकी ही होती है। जब कि उक्त प्रकारके तिर्यंच पंचेन्द्रिय जीवोंकी जघन्य अवगाहना अंगुलके संख्य भागकी हैं जबकि उत्कृष्ट अवगाहना तो योजनशतपृथक्त्व [200 से 900 यो० तक ] की है / [2973] [इति जघन्यावगाहना] - - तीसरा-चौथा उपपात-च्यवन विरहकाल तथा पाँचवां-छठा उसका संख्याद्वार // अवतरण-अवगाहना के द्वारको बताकर, तीसरे, चौथे उपपात च्यवनविरह द्वारको कहनेपूर्वक, पाँचवें छठे संख्याद्वारमें उपपात तथा च्यवन संख्या जघन्यसे कहते हैं। एकेन्द्रिय का उत्पात और च्यवन प्रतिसमय चालु होनेसे उसे इन दो द्वारोंका संभव नहीं है, अतः इन्हें छोड़कर दोइन्द्रियादिक जीवोंमें द्वार घटना कहते हैं / विरहो विगलासनीण, जम्ममरणेसु अंतमुहू // 298 // गब्भे मुहुत्त बारस, गुरुओ लहुओ समय संख सुरतुल्ला // 2983 // गाथार्थ-विकलेन्द्रिय अर्थात् दोइन्द्रिय, त्रिइन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवोंका तथा 4 पाठां०-तणु /
SR No.004267
Book TitleSangrahaniratna Prakaran Bruhat Sangrahani Sutra
Original Sutra AuthorChandrasuri
AuthorYashodevsuri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year1984
Total Pages756
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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