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________________ 170 ] बृहत्संग्रहणीरत्न हिन्दी [गाथा 80-81 अपने-अपने मण्डलस्थानों में ही गमन करते होनेसे ये नक्षत्रमण्डल अवस्थित कहे जाते हैं और इसलिए हरएक प्रतिनक्षत्राश्रयी मण्डलक्षेत्र सम्भवित नहीं है / यदि हरएक नक्षत्रको स्वस्वमण्डल स्थान छोड़कर अन्य मण्डलस्थानों में गमन करनेका हो तो उस मण्डलक्षेत्रकी बात सम्भवित हो सके, लेकिन ऐसा तो नहीं ही है, अतः उसका क्षेत्र भी सम्भवित नहीं है। अट्ठाईस नक्षत्रों के सामुदायिक आठ मण्डल हैं / उनमें दो मण्डल जम्बूद्वीपमें हैं और वे चन्द्र-सूर्य मण्डलवत् 180 योजन मध्यमें हैं / जब कि अवशिष्ट छः नक्षत्रों के मण्डल लवणसमुद्रके ऊपर हैं और वे भी चन्द्र-सूर्य मण्डलवत् 330 योजन क्षेत्र मध्यमें हैं / प्रत्येक नक्षत्रमण्डलका चक्रवालविष्कम्भ एक कोसका और मोटाई आधे कोसकी होती है / इस आयाम और विष्कम्भ विषयक हकीकत पहले (जोयणिग...गाथाके प्रसंगमें ) आ गई है। नक्षत्रोंके कुल आठ मण्डल बताये हैं और वे मण्डल अवस्थिति योगसे जम्बूद्वीपके मेरुको दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा करते घूमते हैं; ये नक्षत्रमण्डल चन्द्रमण्डलके स्थानमें पड़ते हैं, अर्थात् जिस स्थान पर चन्द्रमण्डल होता है उसी स्थान पर ही पड़ता है अर्थात् नक्षत्रोंका स्थान चन्द्रसे चार योजन ऊँचा होनेसे उतने उच्च स्थान पर ही (चन्द्रमाके मण्डलकी ऊर्ध्व समश्रेणिमें ) पड़ता है। वह इस तरह-नक्षत्रका प्रथम मण्डल चन्द्रमाके प्रथम सर्वाभ्यन्तर मण्डल स्थानमें ऊपरी भागमें होता है, जिससे सबसे प्रथम नक्षत्रमण्डल मेरुसे चन्द्रमण्डलबत् 44820 योजन दूर होता है यह सहज है / दूसरा नक्षत्रमण्डल (दूसरे चन्द्र मण्डलको छोड़कर ) तीसरे चन्द्रमण्डलके स्थानके ऊपर पड़ता है / तीसरा नक्षत्रमण्डल ( तीसरे, चौथे, पाँचवें चन्द्रमण्डलको छोड़कर) लवणसमुद्रगत आए हुए छठे चन्द्रमण्डलके स्थान पर पड़ता है। चौथा नक्षत्रमण्डल सातवें चन्द्रमण्डलके स्थान पर, पांचवाँ नक्षत्रमण्डल आठवें चन्द्रमण्डलके स्थान पर, छठा नक्षत्रमण्डल (नवम चन्द्रमण्डलको छोड़कर ) दसवें चन्द्रमण्डलके स्थान पर, सातवाँ नक्षत्रमण्डल ग्यारहवें चन्द्रमण्डलके स्थान पर और अन्तिम आठवाँ नक्षत्रमण्डल ( 12-13-14 चन्द्रमण्डलको छोड़कर ) पन्द्रहवें चन्द्रमण्डल स्थान पर पड़ता है / इससे क्या हुआ ? कि 3-4-5-9-12-13-14 ये सात चन्द्रमण्डलस्थान नक्षत्रमण्डलसे शून्य होते हैं और अवशिष्ट आठ चन्द्रमण्डलस्थान नक्षत्रमण्डलसे युक्त होते हैं। साथ ही अन्तिम नक्षत्रमण्डल लवणसमुद्रगत चन्द्र के अंतिममण्डल स्थानमें कथित होनेसे चन्द्रमण्डलवत् यह अन्तिम सर्वबाह्यनक्षत्रमण्डल मेरुसे अबाधामें 45330 योजन दूर है, यह सिद्ध होता है / अतः 45330 योजनमेंसे 44820 योजन कम करनेसे
SR No.004267
Book TitleSangrahaniratna Prakaran Bruhat Sangrahani Sutra
Original Sutra AuthorChandrasuri
AuthorYashodevsuri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year1984
Total Pages756
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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