________________ प्रकाशकीय पाठकों के कर-कमलों में चतुर्थ उपांग श्रीप्रज्ञापनासूत्र समर्पित करते अतीव प्रमोद का अनुभव हो रहा है। प्रज्ञापनासूत्र विशालकाय आगम है और तत्त्वज्ञान की विवेचना से भरपूर है। इसे समझने के लिए विस्तृत विवेचन की परमावश्यकता है / इस कारण इसे एक जिल्द में प्रकाशित कर सकना संभव नहीं है / अतएव प्रथम खण्ड ही प्रकाशित किया जा रहा है / द्वितीय भाग के अधिकांश का मुद्रण हो चुका है / उसके भी शीघ्र ही तैयार हो जाने की संभावना है। ___ प्रस्तुत प्रागम की विस्तृत प्रस्तावना विख्यात विद्वान् श्री देवेन्द्र मुनिजी म. शास्त्री लिख रहे हैं, किन्तु अस्वस्थता के कारण मुनिश्री उसे पूर्ण नहीं कर सके हैं / अतएव वह प्रस्तावना अन्तिम खण्ड में दी जाएगी और मुद्रित हो रहा है / प्रश्नव्याकरणसूत्र प्रेस में दिया जा चुका है और मुद्रित हो रहा है। प्रज्ञापनासूत्र का अनुवाद और सम्पादन जैनभूषण पंजाबकेसरी पं. र. मुनिश्री ज्ञानमुनिजी महाराज ने किया है। इसके सम्पादन और अनुवाद में जो अर्थव्यय हुआ है, उसका भार जिन साहित्यप्रेमी सज्जनों ने वहन किया है, उनकी सूची साभार अन्यत्र प्रकाशित की जा रही है। श्रीमान् धर्मप्रेमी सेठ एस. सायरचन्दजी चोराडया, मद्रास के विशिष्ट आर्थिक सहयोग से यह पागम प्रकाशित किया जा रहा है, अतएव उनके प्रति भी हम आभारी हैं। श्रमणसंघ के प्रथम प्राचार्य परमपूज्य श्री आत्मारामजी महाराज की जन्मशताब्दी-वर्ष के सुअवसर पर प्रज्ञापनासूत्र का प्रकाशन हो रहा है / अतएव स्व. प्राचार्यसम्राट के महान उपकारों को लक्ष्य में रख कर उन्हीं के कर-कमलों में यह समर्पित किया जा रहा है / आचार्यश्री का परिचय भी संक्षेप में प्रकाशित कर अन्त में जिन-जिन महानुभावों का समिति को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में सहयोग प्राप्त हुआ या हो रहा है, उन सभी के प्रति हम हार्दिक आभार व्यक्त करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं। रतनचन्द मोदी जतनराज महता चांदमल विनायकिया कार्यवाहक अध्यक्ष प्रधान मंत्री मंत्री श्री प्रागम-प्रकाशन-समिति, ब्यावर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org