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________________ माणवक चैत्यस्तम्भ ] [ 97 उन नागदंतों के ऊपर बहुत से रजतमय सीके लटके हैं। उन रजतमय सीकों में बहुत-सी वैडूर्य रत्नों से बनी हुई धूपघटिकायें रखी हैं / वे धूपघटिकायें काले अगर, श्रेष्ठ कुन्दुरुष्क आदि को सुगंध से मन को मोहित कर रही हैं। मारणवक चैत्यस्तम्भ १७३–सभाए णं सुहम्माए अंतो बहुसमरमणिज्जे भूभिभागे पण्णत्ते जाव मणोहिं उबसोभिए मणिफासो य उल्लायो य। तस्स गं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महेगा मणिपेढिया पण्णत्ता, सोलस जोयणाई प्रायामविक्खंभेणं अट्ठ जोयणाई बाहल्लेणं सबमणिमयो जाव पडिरूवा। १७३-उस सुधर्मा सभा के भीतर अत्यन्त रमणीय सम भूभाग है / वह भूमिभाग यावत् मणियों से उपशोभित है आदि मणियों के स्पर्श एवं चंदेवा पर्यन्त का सब वर्णन यहाँ पूर्ववत् कर लेना चाहिये। उस अति सम रमणीय भूमिभाग के अति मध्यदेश में एक विशाल मणिपीठिका बनी हुई है। जो आयाम-विष्कम्भ की अपेक्षा सोलह योजन लंबी-चौड़ी और पाठ योजन मोटी तथा सर्वात्मना रत्नों से बनी हुई यावत् प्रतिरूप-अतीव मनोरम है / १७४-तीसे गं मणिपेढियाए उरि एत्थ णं माणवए चेइएखंभे पण्णते, सदि जोयणाई उड्ढे उच्चत्तेणं, जोयणं उन्हेणं, जोयणं विक्खंभेणं, अडयालीसंसिए, अडयालीसइ कोडीए, अडयालीसइ विग्गहिए सेसं जहा महिंदज्झयस्स / माणबगस्स णं चेइयखंभस्स उरि बारस जोयणाई प्रोगाहेत्ता, हेटावि बारस जोयणाई वज्जेत्ता, मज्झे छत्तोसाए जोयणेसु एत्थ णं बहवे सुवण्णरूपमया फलगा पण्णत्ता / तेसु णं सुदण्णरूपाएसु फलएसु बहवे वइरामया णागदंता पण्णता / तेसु णं वइरामएसु नागदंतेसु बहवे रययामया सिक्कगा पण्णता। तेसु णं रययामएसु सिक्कएसु बहवे वइरामया गोलवट्टसमुग्गया पण्णत्ता / तेसु णं वयरामएसु गोलवट्टसमुग्गएसु बहवे जिणसकहातो संनिक्खित्तानो चिट्ठति / तानो णं सूरियाभस्स देवस्स अन्नेसि च बहूणं देवाण य देवीण य अच्चणिज्जासो जाव पज्जु. वासणिज्जायो। माणवगस्स चेइयखंभस्स उरि अट्ठ मंगलगा, झया, छत्ताइच्छत्ता / १७४–उस मणिपीठिका के ऊपर एक माणवक नामक चैत्यस्तम्भ है / वह ऊँचाई में साठ योजन ऊँचा, एक योजन जमीन के अंदर गहरा, एक योजन चौड़ा और अड़तालोस कोनों, अड़तालोस धारों और अड़तालीस आयामों-पहलुओं वाला है। इसके अतिरिक्त शेष वर्णन माहेन्द्रध्वज जैसा जानना चाहिए। उस माणवक चैत्यस्तम्भ के ऊपरी भाग में बारह योजन और नोचे बारह योजन छोड़कर मध्य के शेष छत्तीस योजन प्रमाण भाग–स्थान में अनेक स्वर्ण और रजतमय फरक-पाटिये लगे हए हैं। उन स्वर्ण-रजतमय फलकों पर अनेक वज्रमय नागदंत-खूटिया हैं / उन बज्रमय नागदंतों पर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003481
Book TitleAgam 13 Upang 02 Rajprashniya Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages288
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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