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________________ उपकारिकालयन का वर्णन ] [85 और 3. अद्धापल्य / इनमें से व्यवहार पल्य का इतना ही उपयोग है कि उसके द्वारा उद्धारपल्य और अद्धापल्य की निष्पत्ति होती है / उद्धारपल्य के द्वारा द्वीप और समुद्रों की संख्या और अद्धापल्य के द्वारा जीवों की आयु आदि का विचार किया जाता है। सर्वार्थसिद्धि, तत्वार्थराजवातिक और त्रिलोकसार में इनका विशद रूप में विवेचन किया गया है। उपकारिकालयन का वर्णन १५३--सरियाभस्स णं देवविमाणस्स घेतो बहुसमरमणिज्जे भूमिमागे पण्णते, तंजहा-वणसंडविहूणे जाव बहवे वेमाणिया देवा देवीयो य प्रासयंति जाव विहरति / तस्स णं बहसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झवेसे एत्थ णं महेगे उवगारियालयणे पण्णत्ते, एगं जोयणसयसहस्सं पायामविक्खंभेणं, तिणि जोयणसयसहस्साई सोलस सहस्साई दोणि य सत्तावीसं जोयणसए तिन्निय कोसे अट्ठावीसं च धणसयं तेरस य अंगुलाई अद्ध गुलं च किचिविसेसूर्ण परिक्खेवेणं, जोयणं बाहल्लेणं सव्वजंबूणयामए अच्छे जाव पडिरूवे। १५३–सूर्याभ नामक देवविमान के अंदर अत्यन्त समतल एवं अतीव रमणीय भूमिभाग है / शेष बहुत से वैमानिक देव और देवियों के बैठने से लेकर विचरण करने तक का वर्णन पूर्ववत् कर लेना चाहिए / किन्तु यहाँ वनखंड का वर्णन छोड़ देना चाहिए / उस अतीव सम रमणीय भूमिभाग के बीचों-बीच एक उपकारिकालयन बना हुआ है। जो एक लाख योजन लम्बा-चौड़ा है और उसकी परिधि (कुल क्षेत्र का घेराव) तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताईस योजन तीन कोस एक सौ अट्ठाईस धनुष और कुछ अधिक साढ़े तेरह अंगुल है। एक योजन मोटाई है / यह विशाल लयन सर्वात्मना (पूरा का पूरा) स्वर्ण का बना हुआ, निर्मल यावत् प्रतिरूप-अतीव रमणीय है। विवेचन--उपकारिकालयन-प्रशासनिक कार्यों की व्यवस्था के लिए निर्धारित सचिवालय सरीखे स्थान विशेष को कहना चाहिये---सौधोऽस्त्री राजसदनम् उपकार्योपकारिका' (अमरकोश द्वि. कां. पुरवर्ग श्लोक 10, हैम अभिधान कां. 4 श्लोक५६)। किन्तु 'पाइअसहमहण्णवो' में उवगारिया+लयण (लेण) इस प्रकार समास पद मानकर उवगारिया का अर्थ प्रासाद आदि की पीठिका और लयण (लेण) का अर्थ गिरिवर्ती पाषाण-गृह बताया है। यहाँ के वर्णन से प्रतीत होता है कि प्रासाद आदि की पीठिका अर्थ ग्रहण किया है। १५४–से णं एगाए पउमवरवेइयाए एगेण य वणसंडेण य सव्वतो समंता संपरिक्खित्ते / १५४~-वह उपकारिकालयन सभी दिशा-विदिशाओं में सब ओर से एक पद्मवरवेदिका और एक वनखंड (उद्यान) से घिरा हुआ है। पद्मवरवेदिका का वर्णन १५५-सा णं पउमवरवेइया प्रद्धजोयणं उर्ल्ड उच्चत्तेणं, पंच धणुसयाई विक्खंभेणं उवकारियलेणसमा परिक्खेवेणं / तोसे णं पउमवरवेइयाए इमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते, तंजहा वयरामया णिम्मा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003481
Book TitleAgam 13 Upang 02 Rajprashniya Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages288
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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