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________________ वनखंडवौं वापिकाओं आदि का वर्णन ] [79 पत्तेयं-पत्तेयं पउमवरदेदियापरिक्खित्तानो, पत्तेयं-पत्तेयं वणसंडपरिक्खित्तायो। __अप्पेगइयानो पासवोयगाो, अप्पेगइयायो वारुणोयगाओ, अप्पेगइयानो खीरोयगाओ, अप्पेगइयानो घनोयगायो, अप्पेगइयाओ खोदोयगानो' अप्पेगतियानो पगतीए उयगरसेणं पण्णत्तायो, पासादीयानो दरिसणिज्जानो अभिरुवायो पडिरूवाप्रो। १४३–उन वनखंडों में जहाँ-तहाँ स्थान-स्थान पर अनेक छोटी-छोटी चौरस वापिकायेंबावड़ियाँ, गोल पुष्करिणियाँ, दीपिकायें (सीधी बहती नदियाँ), गुजालिकायें (टेड़ी-तिरछीबांकी बहती नदियां), फूलों से ढंकी हुई सरोवरों की पंक्तियाँ, सर-सर पंक्तियाँ (पानी के प्रवाह के लिये नहर द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए तालाबों की पंक्तियाँ) एवं कूपपंक्तियाँ बनी हुई हैं। इन सभी वापिकाओं आदि का बाहरी भाग स्फटिमणिवत अतीव निर्मल, स्निग्ध-कमनीय है। इनके तट रजतमय हैं और तटवर्ती भाग अत्यन्त सम-चौरस हैं / ये सभी जलाशय वज्ररत्न रूपी पाषाणों से बने हुए हैं। इनके तलभाग तपनीय स्वर्ण से निर्मित हैं तथा उन पर शुद्ध स्वर्ण और चांदी की बालू बिछी है / तटों के समीपवर्ती ऊँचे प्रदेश (मुडेर) वैडूर्य और स्फटिक मणि-पटलों के बने हैं। इनमें उतरने और निकलने के स्थान सुखकारी हैं। घाटों पर अनेक प्रकार की मणियाँ जड़ी हुई हैं / चार कोने वाली वापिकाओं और कुत्रों में अनुक्रम से नीचे-नीचे पानी अगाध एवं शीतल है तथा कमलपत्र, बिस (कमलकंद) और मृणालों से ढंका हुआ है / ये सभी जलाशय विकसित-खिले हुए उत्पल, कुमुद, नलिन, सुभग, सौगंधिक, पुंडरीक, शतपत्र तथा सहस्र-पत्र कमलों से सुशोभित हैं और उन पर पराग-पान के लिये भ्रमरसमूह गूंज रहे हैं। स्वच्छ-निर्मल जल से भरे हुए हैं / कल्लोल करते हुए मगर-मच्छ कछुआ आदि बेरोक-टोक इधर-उधर घूम फिर रहे हैं और अनेक प्रकार के पक्षिसमूहों के गमनागमन से सदा व्याप्त रहते हैं।। ये सभी जलाशय एक-एक पद्मवरवेदिका और एक एक वनखंड से परिवेष्टित-घिरे इन जलाशयों में से किसी में पासव जैसा, किसी में वारुणोदक (वारुण समुद्र के जल) जैसा, किसी में क्षीरोदक जैसा, किसी में घी जैसा, किसी में इक्षुरस जैसा और किसी-किसी में प्राकृतिकस्वाभाविक पानी जैसा पानी भरा है। ये सभी जलाशय मन को प्रसन्न करने वाले, दर्शनीय, अभिरूप और प्रतिरूप हैं। १४४--तासि णं वावीणं जाव बिलपंतीणं पत्तेयं पत्तेयं चउहिसि चत्तारि तिसोपाणपडिरूवगा पण्णता, तेसि णं तिसोपाणपडिरूवगाणं अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते, तं जहा–बइरामया नेमा"..... तोरणाणं छत्ताइछत्ता य यव्वा / १४४-उन प्रत्येक वापिकाओं यावत् कूपपंक्तियों की चारों दिशाओं में तीन-तीन सुन्दर सोपान बने हुए हैं / इन त्रिसोपान प्रतिरूपकों का वर्णन इस प्रकार है, जैसे—उनकी नेमें वज्ररत्नों की हैं इत्यादि तोरणों, ध्वजाओं और छत्रातिछत्रों पर्यन्त इनका वर्णन पूर्ववत् समझ लेना चाहिए / 1. पाठान्तरअप्पेगइपायो खारोयगायो। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003481
Book TitleAgam 13 Upang 02 Rajprashniya Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages288
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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