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________________ ( १३ ) जिनमूर्तियाँ, जिनमन्दिर एवं जैनतीर्थं इनके दर्शनपूजन सम्यक्त्व की शुद्धि, सम्यक्त्व की प्राप्ति तथा सम्यक्त्व की दृढ़ता के लिए कारण माने गये हैं । श्री श्राचाराङ्ग, श्रावश्यक इत्यादि श्रागमसूत्रों तथा नियुक्तियों श्रादि में प्राज भी इन स्थावर तीर्थों का निर्देश मिलता है । इससे स्पष्ट है कि जिनमूर्तियों, जिनमन्दिरों तथा जैनतीर्थों के दर्शन-पूजन आदि का लाभ अहर्निश प्रवश्य ही लेना चाहिए । श्रीवीर सं.- २५१५ विक्रम सं.- २०४५ मागशर सुद-६ बुधवार दिनांक - १४-१२-८८ [ श्री कुन्थुनाथ जिन मन्दिर प्रतिष्ठा दिन ] 卐 00 जैन भवन मु. साथीन वाया - पीपाड़ शहर जिला - जोधपुर राजस्थान (मारवाड़)
SR No.002338
Book TitleJinmandiradi Lekh Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSushilsuri, Ravichandravijay
PublisherSushil Sahitya Prakashan Samiti
Publication Year1997
Total Pages220
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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