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________________ श्राद्धविधि प्रकरणम् . 13 की उपेक्षा न करना इसमें तो कहना ही क्या है? क्या चंद्रमा अपने आश्रित खरगोश के बालक को क्षुद्र होने से उसे गोद में से अलग पटक देता है? नहीं, हे राजन्! तूं जगत् में श्रेष्ठ व आर्य होते हुए भी अनार्य की तरह क्षणभर में मुझे भूल गया, परन्तु मैं क्षुद्र प्राणी तेरे समान मनुष्य को कैसे भूल सकता हूँ?' . तोते के ये वचन सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और गांगलि ऋषि को प्रणामकर शीघ्र स्त्री समेत घोड़े पर बैठकर तोते के पीछे चला। अपने नगर को पहुंचने की बड़ी उत्सुकता से राजा तोते के पीछे-पीछे जा रहा था।ज्यों ही उसका क्षितिप्रतिष्ठित नगर कुछ-कुछ नजर आने लगा तब वह तोता सुस्त होकर एक वृक्ष पर बैठ गया। यह देख चकित होकर राजा ने आग्रहपूर्वक तोते से पूछा, 'हे तोते! यद्यपि नगर के महल कोट आदि दिखायी देते हैं तथापि अभी नगर दूर है, तूं इस तरह अप्रसन्न होकर क्यों बैठ गया?' तोते ने हुंकार (हां) देकर कहा कि, 'ऐसा करने का एक भारी कारण है। पंडितजन बिना कारण कोई भी कार्य नहीं करते हैं।' राजा ने घबराकर पूछा, 'वह क्या?' तोता बोला -हे राजन्! सुन। चन्द्रपुरी के राजा चन्द्रशेखर की चन्द्रवती नामक बहन जो कि तेरी प्यारी स्त्री है वह अन्दर से कपटी व ऊपर से मधुर भाषण करनेवाली होने से गाय के समान मुंहवाले सिंह के समान है। जल के समान स्त्री की भी प्रायः टेढ़ी गति होती है। 'तूं वैरागि की तरह राज्य छोड़कर कहीं दूर चला गया है' यह सोचकर इच्छित अवसर मिलने से प्रबल हुई शाकिनी समान तेरी स्त्री ने तुरत अपने भाई को खबर दी कि 'राज्य छीनने का यह मौका है' अपना स्वार्थ साधने के लिए कपट ही एक मात्र अबलाओं का भारी बल है। बहन का संदेश पाकर चन्द्रशेखर ने चतुरंगिणी सेना के साथ आकर तेरे राज्य को लेने के लिए चढ़ायी की है। भला सामने आया राज्य कौन छोड़े? शत्रु को देखकर तेरे वीर सरदारों ने भीतर से नगर के द्वार बंध कर दिये। इधर जिस तरह सर्प अपने शरीर से धन को घेरता है उसी तरह चन्द्रशेखर ने अपनी सेना से चारों तरफ से नगर को घेर लिया है। तेरे पराक्रमी सरदार नगर के अन्दर चारों तरफ खड़े रहकर शत्रु से लड़ रहे हैं; परंतु 'नायक बिना सेना दुर्बल है' इस कहावत के अनुसार अपने आपको बिना नायक समझनेवाली तेरी सेना किस प्रकार जीत सकती है? इस समय हम नगर में किस प्रकार जा सकेंगे? इससे राजन्! मैं मन में बहुत चिंतित होकर इस वृक्ष पर बैठा हूँ। तोते के मुंह से यह हृदय-विदारक बात सुनते ही राजा के मन में संताप को जाने का. मार्ग मिल गया अर्थात् संताप उत्पन्न हुआ पश्चात् मन में विचार किया, 'दुष्ट आचरणवाली स्त्री के मन के अन्दर रहनेवाले कपट को धिक्कार है! चन्द्रशेखर राजा का भी यह कैसा साहस! उसके मनमें जरा भी डर नहीं! उसे अपने स्वामी के राज्य हरण की अभिलाषा हुई! यह उसका कितना भारी अन्याय! अथवा चन्द्रशेखर का क्या
SR No.002285
Book TitleShraddhvidhi Prakaranam Bhashantar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherJayanandvijay
Publication Year2005
Total Pages400
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual, & Vidhi
File Size8 MB
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