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________________ प्राचार्य हरिभद्र ने कितने ग्रन्थ लिखे, इसके संबंध में विभिन्न विद्वानों की विभिन्न मान्यताएं उपलब्ध हैं। यहां कुछ मान्यताओं का उल्लेख किया जायगा। १. अभयदेव सूरि ने पंचासग को टीका में, मुनिचन्द्र ने उपदेशपद की टीका में और वादिदेव सूरि ने अपने स्यावाद रत्नाकर में, प्राचार्य हरिभद्र सूरि को १,४०० प्रकरणों का रचयिता कहा है । २. राजशेखर सूरि ने अपनी अर्थदीपिका में तथा विजयलक्ष्मी सूरि ने अपने उपदेश प्रासाद में इनको १,४४४ प्रकरणों का रचयिता बताया है। ३. राजशेखर सूरि ने अपने प्रबन्ध कोश में इनको १,४४० प्रकरणों का रचयिता कहा है। ___इस संख्या और इससे सम्बद्ध कथानक को विद्वानों ने प्रामाणिक नहीं माना है। यहां संक्षिप्त कथानक उद्धृत किया जाता है। अपने दो शिष्यों--हंस और परमहंस के वध के पश्चात् हरिभद्र को अत्यन्त सन्ताप और बौद्ध साधुओं के प्रति प्रतिशोध की तीव्र भावना उत्पन्न हुई। इन्होंने बौद्धों से शास्त्रार्थ की घोषणा की। जो-जो बौद्ध साधु इनसे शास्त्रार्थ में हारते जाते थे, उन सबको उबलते हुए तेल के कड़ाह में जिन्दा ही गिरना पड़ता था। इस प्रकार लगभग १,४०० बौद्ध साधुओं को उक्त दशा प्राचार्य के हाथों हुई। यह संवाद जब उनके गुरु को मिला तो उन्होंने निदान और उसके ऊपर हरिभद्र को तीन गाथाएं लिखकर भेजी, जिन्हें पढ़कर हरिभद्र का क्रोध शांत हुआ। उन गाथाओं को आधार मानकर हरिभद्र ने समराइच्चकहा की रचना की और जितने बौद्ध स्वाहा हुए थे, पश्चाताप स्वरूप उतने ही प्रकरण रचने की प्रतिज्ञा की। भद्रेश्वर की कथावलि में यह घटना कुछ भिन्न रूप में मिलती है। वहां बताया गया है कि शिष्यों के वध में प्राचार्य को अत्यन्त क्लेश और निराशा हई तथा वे स्वयं आत्महत्या करने पर उतारू हो गये। परन्त उनके गुरु ने उनके दुःख का आवेग शान्त किया और ग्रन्थ सन्तति को ही अपनी शिष्य सन्तति मानकर ग्रन्थ रचना में प्रवृत्त किया। शोध मनीषियों ने शास्त्रार्थ सम्बन्धी कथा को नितान्त कल्पित किंवदन्ती कहा है । अभिमत है कि हरिभद्र ने सहस्त्राधिक प्रकरणों की रचना की और आज उनके नाम भी नहीं मिलते, यह असम्भव है कि इनके अनुसार प्रकरण का अर्थ स्वतंत्र नहीं, बल्कि ग्रन्थ का अध्याय हो । जैसे पंचासग में पचास, विशिका में बीस, षोडशक में सोलह और अष्टक में बत्तीस । परन्तु इस प्रकार भी संख्या सहस्र के निकट नहीं पहुंचती है। अबतक कुल मिलाकर लगभग एक सौ ग्रन्थों के नामों का पता लगा है, जो प्राचार्य हरिभद्र सूरि के द्वारा रचे हुए कहे जा सकते हैं। इनमें उपलब्ध ,अनुपलब्ध लगभग पचास ग्रन्थ ऐसे हैं, जो निश्चित रूप से प्राचार्य हरिभद्र सरि के द्वारा रचे हुए माने १--गुणसे ण-अग्गिसम्मा सीहाणंदा य तह पियापुत्ता। सिहि जालिणि माइसुपा धण धणसिरियो य पइभज्जा ।।१।। जय-विजया य सहोअर धरणो लच्छी य तहप्पई भज्जा। सेण विसेणा पित्तियउत्ता जम्मम्मि सत्तमए ॥२॥ गणचंद-वाणमंतर समराइच्च गिरिसण पाणो य। एगस्स तो मुक्खो रगतो अण्णस्स संसारो ॥३॥ सम० प्र० गा० २३---२५। २--प्रभावक चरित और राजशेखर के प्रबन्धकोश के आधार पर। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002143
Book TitleHaribhadra ke Prakrit Katha Sahitya ka Aalochanatmak Parishilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherResearch Institute of Prakrit Jainology & Ahimsa Mujjaffarpur
Publication Year1965
Total Pages462
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size22 MB
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