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________________ [धर्म और धर्मी का भेदाभेद ] ऊपर यह बतलाया जाचुका है कि जैन दर्शन धर्म और धर्मी को अत्यन्त भिन्न अथच अभिन्न नहीं मानता किन्तु सापेक्षतया इनका भेदाभेद ही उसे अभिमत है। परन्तु योगभाष्य और उसकी तस्वविशारदी टीका में भी उक्त सिद्धान्त का निम्नलिखित वाक्यों में सुचारु रूप से प्रतिपादन किया है। योग भाष्य में धर्म और धर्मी के विषय में विचार करते हुए भाष्यकार लिखते हैं नर धर्मी त्र्यध्वा धर्मास्तु यध्वानः ते लक्षिता अलक्षिताश्च तान्तामवस्थां प्राप्नुवन्तोऽन्यत्वेन प्रति निर्दिश्यन्ते अवस्थान्तरतो न द्रव्यान्तरतः । यथैका रेखा शतस्थाने शतं दशस्थाने दशैकं चैक (१) न धर्म धर्मित्व मतीवभेदे वृत्यास्ति चेन्न तृतयं च कास्ति । इहेद मित्यस्ति मतिश्च वृत्तौ न गौण भेदोपि च लोक बाधः|७ (इति अन्ययोग व्यवच्छेद द्वात्रिंशिकायाम हेमचन्दाचार्यः) (२) अयंच लक्षणपरिणामो न धर्मिणो येनाननुगतत्वप्रसंगः किन्तु धर्मस्येस्याह न इति । यसो धर्मा घटादयएव त्र्यधानः अतीतादिकालयोगनो, न धर्मी मृदादिः अतस्ते घटादयो धर्माएव तां तां नव पुरातनाद्यवस्था प्राप्नुवंतोऽवस्थान्तरत्त एव भिन्नत्वेन निर्दिश्यन्ते न धर्मिणः सकाशात् । द्रव्यस्य धर्मिणः सर्वावस्थास्वनुगतत्वादिति भावः (टिप्पणीकारो बालराम:) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002141
Book TitleDarshan aur Anekantavada
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Sharma
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1985
Total Pages236
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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