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________________ १४ : जैन और बौद्ध भिक्षुणी-संघ में जाकर संन्यास ग्रहण कर लिया। इसी प्रकार का उदाहरण यशभद्रा' का है, जिसके पति के ऊपर उसके ज्येष्ठ भ्राता ने आक्रमण किया था । वह भी भयभीत होकर श्रावस्ती के जंगल में भाग गई और वहीं उसने संघ में दीक्षा ग्रहण की। बाद में उसका पुत्र क्षुल्लककुमार उत्पन्न हुआ, जो भिक्षु बना । करकण्डु जो रानी पद्मावती का पुत्र था, पद्मावती के प्रव्रज्या ग्रहण करने के पश्चात् पैदा हुआ था। जैन अनुश्रुति के अनुसार बाद में वह कलिंग का राजा हुआ । इसी प्रकार भाई के साथ बहनों के प्रव्रज्या ग्रहण करने का उल्लेख प्राप्त होता है । भिक्षुणी उत्तरा' ने जो आचार्य शिवभूति की बहन थी, भाई का अनुसरण करते हुए प्रव्रज्या ग्रहण की थी । बाल-विधवा धनश्री * ने भी अपने भाई के साथ ही प्रव्रज्या ग्रहण की थी । भिक्षु स्थूलभद्र की सात बहनें थीं- यक्षा, यक्षदत्ता भूता भूतदत्ता, सेणा, रेणा । सातों बहनों ने अपने भाई को प्रव्रज्या ग्रहण करते हुए देखकर जैन भिक्षुणीसंघ में प्रवेश लिया था । ज्ञाताधर्मकथा में पोट्टिला' तथा सुकुमालिका का उदाहरण मिलता है, जिन्होंने अपने प्रति पति के प्रेम में कमी होने के कारण प्रव्रज्या ग्रहण की थी । उपर्युक्त उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि सामान्यतया नारियाँ अपने संरक्षक (पति, पुत्र, भाई अथवा अन्य कोई) की मृत्यु या उसके प्रव्रज्या ग्रहण कर लेने के उपरान्त स्वयं भी प्रव्रजित हो जाती थीं । अन्तकृत - दशांग में उल्लिखित काली - सुकाली' आदि के उदाहरण द्रष्टव्य हैं । इसके अतिरिक्त बहुत-सी स्त्रियाँ विद्वान् साधुओं के धर्मोपदेश को सुनकर संन्यास - जीवन का आश्रय ग्रहण करती थीं । अंतकृतदशाङ्ग में जाम्बकुमार की पत्नियों तथा कृष्ण-वासुदेव की पत्नियों का उल्लेख ९ १. आवश्यक निर्युक्ति, १२८३; बृहत्कल्पभाष्य, पंचम भाग, ५०९९. २. आवश्यक चूर्णि द्वितीय भाग, पृ० २०४-०७. , ३. उत्तराध्ययन निर्युक्ति, पृ० १८१. ४. आवश्यक चूर्ण, प्रथम भाग, पृ० ५२६-२७. ५. आवश्यक चूर्णि, द्वितीय भाग, पृ० १८३, कल्पसूत्र, २०८. ६. ज्ञाताधर्मकथा, १1१४. ७. वही, १/१६. ८. अन्तकृतदशांग, आठवाँ वर्ग । ९. वही, पंचम वर्ग । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002086
Book TitleJain aur Bauddh Bhikshuni Sangh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorArun Pratap Sinh
PublisherParshwanath Shodhpith Varanasi
Publication Year1986
Total Pages282
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size11 MB
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