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________________ ६४ पिंडनियुक्ति जाता है तो अजित के अनुयायी साधु के लिए वह कल्प्य होता है। यदि चातुर्यामिक साधु को लक्ष्य करके कोई आधाकर्म निष्पन्न करता है तो ऋषभ और अजित दोनों के साधुओं के लिए वह अकल्पनीय होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व और अंतिम तीर्थंकर के संघ को उद्दिष्ट करके बनाया हुआ आधाकर्म किसी के लिए ग्राह्य नहीं होता। यदि व्यक्तिगत किसी साधु के लिए आधाकर्म भोजन निष्पन्न है तो प्रथम और अंतिम तीर्थंकर के साधुओं में वह किसी भी साधु के लिए कल्प्य नहीं होता। यदि मध्यम तीर्थंकर के किसी साधु के लिए आधाकर्म निष्पन्न होता है तो उसके लिए अकल्प्य होता है, शेष साधु उसे ग्रहण कर सकते हैं लेकिन उस आहार को प्रथम और अंतिम तीर्थंकर के साधु ग्रहण नहीं कर सकते। इसका कारण बताते हुए भाष्यकार कहते हैं कि प्रथम तीर्थंकर के साधु ऋजुजड़ होने के कारण अकृत्य करके उसकी आलोचना तो करते हैं लेकिन उसके समान अन्य दोषों का परिहार नहीं कर पाते। उस समय के गृहस्थों की जड़ता यह है कि वे एक के लिए वर्जित दोष युक्त आहार दूसरों के निमित्त कर देते हैं। मध्यम २२ तीर्थंकरों के साधु ऋजुप्राज्ञ होते हैं। ऋजु होने के कारण वे एकान्त में हुए अकृत्य की आलोचना ऋजुता से करते हैं तथा उनका प्राज्ञत्व इस बात में है कि वे तज्जातीय भिक्षा सम्बन्धी दोषों का निवारण भी स्वयं कर देते हैं। उस समय के गृहस्थ भी साधुओं के लिए आरंभ-समारंभ रूप दोष नहीं करते हैं तथा तज्जातीय अन्य दोषों का वर्जन करते हैं। अंतिम तीर्थंकर के शिष्य वक्रजड़ होते हैं। वक्र होने के कारण वे सहजतया अकृत्य को स्वीकार नहीं करते तथा जड़ होने के कारण पुन: आधाकर्म आदि अपराधपद का सेवन करते रहते हैं। गृहस्थ मायापूर्वक आधाकर्म निष्पन्न करने पर भी यह कहता है कि मेहमान आने के कारण या उत्सव के कारण यह खाद्य तैयार किया गया है। आधाकर्म ग्रहण के अपवाद यदि आधाकर्म आहार अवग्रहान्तरित हो जाए अर्थात् इंद्र के अवग्रह के अन्तर्गत आ जाए तो वह आहार कल्प्य हो सकता है। इस प्रसंग में भगवान् ऋषभ के समय में घटित घटना प्रसंग का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। एक बार भगवान् ऋषभ अष्टापद पर्वत पर ससंघ समवसृत हुए। भगवान् के आगमन को सुनकर चक्रवर्ती भरत भी सम्पूर्ण ऋद्धि के साथ भगवान् के दर्शन करने पहुंचे। भगवान् को १. बृभा ५३४८, टी पृ. १४२० ; एतच्च 'स्थापनामात्रं' यदि साधुओं का आपस में एकत्र रहना होता है तो वे प्ररूपणामात्रं संज्ञाविज्ञानार्थं क्रियते, बहकालान्तरितत्वेन पंचयाम से चातुर्याम अथवा चातुर्याम से पंचयाम में पूर्व-पश्चिमसाधूनामेकत्रासम्भवात् तत्र परस्परं ग्रहणं प्रव्रजित होते हैं। 'नास्ति' न घटते-भाष्यकार ने स्पष्ट उल्लेख किया है २. बृभा ५३४८-५०, टी. पृ. १४२० । कि यह बात समझाने के लिए प्ररूपित की गई है। पूर्व ३. बृभा ५३५६, टी पृ. १४२२ । और पश्चिम साधुओं का एकत्र समवाय असंभव है। ४. बृभा ५३५७, टी पृ. १४२२, १४२३। उनका परस्पर आदान-प्रदान या ग्रहण घटित नहीं होता। ५. बृभा ५३५८, टी पृ. १४२३ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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