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________________ ७४ पद्मपुराणे विनोदान् प्रस्तुतान्मुक्त्वा वाष्पपूरितलोचनाः । भूषणस्वनभूयिष्ठं रुरुदुः प्रमदाङ्गनाः ॥९॥ पितरं तादृशं दृष्ट्वा भरतः प्रतिबुद्धवान् । अचिन्तयदहो कष्टं दुश्छेद्यं स्नेहबन्धनम् ॥१५॥ अव्यापारेण तातस्य किमेतेन प्रबोधिनः । चिन्ता राज्यगता कास्य प्रव्रज्या कर्तुमिच्छतः ।।१६।। आपृच्छया न मे किंचित्कार्यमाशु विशाम्यहम् । तपोवनं महादुःखसंसारक्षयकारणम् ।।९७।। देहेनापि किमेतेन व्याधिगेहेन नाशिना । बान्धवेषु तु कावस्था स्वकर्मफलभोगिषु ॥२८॥ जन्तुरेकक एवायं भवपादपसंकुले । मोहान्धो दुःखविपिने कुरुते परिवर्तनम् ।।९९॥ ततः कलाकलापज्ञा भरतस्येगिस्तादिभिः । केकया चिन्तितं ज्ञात्वा दधाना शोकमुत्तमम् ।।१००॥ कथं मे न भवेद् भर्ता न च पुत्रो गुणालयः । एतयोरिणे कुर्वे कमुपायं सुनिश्चितम् ॥१०॥ एवं चिन्तामुपेतायाः परमं व्याकुलात्मनः । तस्या वरोऽभवच्चित्ते गत्वा च त्वरितं ततः ॥१०२॥ प्रीत्या परमया दृष्ट्वा सावष्टम्भ नराधिपम् । जगादार्धासने स्थित्वा तेजसा पुरुणान्विता ।।१०३।। सर्वेषां भूभृतां नाथ पत्नीनां च पुरस्त्वया । मनीषितं ददामीति यदुक्ताहं प्रसादिना ॥१०॥ वरं संप्रति तं यच्छ मह्यं सत्यसमुज्ज्वला । दानेन तेऽखिलं लोकं कीर्तिभ्रंमति निर्मला ॥१०५।। ततो दशरथोऽवोचद अहि त्वं दक्षिणां प्रिये । प्रार्थयस्व यदिष्टं ते यच्छाम्येष वराशये ॥१०॥ समस्त अन्तःपुर एकत्रित हो परम शोकको प्राप्त हुआ ॥९३|| स्त्रियोंने जो विनोद प्रारम्भ कर रखे थे उन्हें छोड़कर आँसुओंसे नेत्र भर लिये तथा आभूषणोंका अत्यधिक शब्द करती हुई वे रुदन करने लगीं ।।९४॥ पिताको विरक्त देख भरत भी प्रतिबोधको प्राप्त हुआ। वह विचार करने लगा कि अहो ! यह स्नेहका बन्धन बड़ा कष्टकारी तथा दु:खसे छेदने योग्य है ॥९५।। वह सोचने लगा कि सम्यक्ज्ञानके प्राप्त हए पिताको इस अव्यापार अर्थात नहीं करने योग्य चिन्तासे क्या प्रयोजन है ? जब ये दीक्षा ही लेना चाहते हैं तब इन्हें राज्यको चिन्ता क्यों होनी चाहिए? ॥९६॥ मुझे किसीसे पूछनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, मैं तो तीव्र दुःखसे भरे संसारके क्षयका कारण जो तपोवन है उसमें शीघ्र ही प्रवेश करता हूँ ॥९७॥ रोगोंके घरस्वरूप इस नश्वर शरीरसे भी मुझे क्या प्रयोजन है ? फिर भाई-बन्धु जो अपने-अपने कर्मका फल भोग रहे हैं उनसे क्या प्रयोजन हो सकता है ? ॥९८॥ मोहसे अन्धा हुआ यह प्राणी अकेला ही जन्मरूपी वृक्षोंसे व्याप्त इस दुःखदायी अटवीमें भ्रमण करता रहता है ।।९९॥ तदनन्तर कलाओंके कलापको जाननेवालो केकयी चेष्टाओंसे भरतका अभिप्राय जानकर अत्यधिक शोक करने लगी ॥१००। वह सोचने लगी कि भर्ता और गुणी पुत्र दोनों ही मेरे नहीं हो रहे हैं अर्थात् दोनों ही दीक्षा धारण करनेके लिए उद्यत हैं। इन दोनोंको रोकनेके लिए मैं किस निश्चित उपायका अवलम्बन करूं? ॥१०१॥ इस प्रकार चिन्ताको प्राप्त तथा अत्यन्त व्याकुल हृदयको धारण करनेवाली केकयाके मन में शीघ्र ही स्वीकृत वर माँगनेकी बात याद आ गयो ॥१०२।। वह अपने विचारोंमें दृढ़ राजा दशरथके पास बड़ी प्रसन्नतासे गयी और बहुत भारी तेजके साथ अर्द्धासनपर बैठकर बोली कि हे नाथ ! आपने उस समय प्रसन्न होकर समस्त राजाओं और पत्नियोंके सामने कहा था कि 'जो तू चाहेगी दूंगा' । सो हे नाथ ! इस समय वह वर मुझे दीजिए। सत्यधर्मके कारण उज्ज्वल तथा निर्मल जो आपकी कोति है. वह दानके प्रभावसे समस्त संसारमें फैल रही है ।।१०३-१०५।। तदनन्तर राजा दशरथने कहा कि हे प्रिये ! तू अपना अभिप्राय बता। हे उत्कृष्ट अभिप्रायको धारण करनेवाली प्रिये ! जो तुझे इष्ट हो सो माँग। अभी देता १. तावस्य म. । २. -रेककया वायं म. । ३. कीर्तिसमुज्ज्वला म. । ४. रक्तत्वादीक्षणां ज., ख., ब. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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