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________________ त्रिंशत्तम पर्व इत्युक्त्वानन्दवाष्पेण तरत्तारकलोचनः । साक्षात्पुत्रमिव प्राप्त लेखहारं स सष्वजे ॥१५॥ नग्नतापरिहारेण देहस्थं वस्त्रभूषणम् । ससंभ्रमं ददौ तस्मै मुदा 'नृत्तमिवाचरन् ॥१५२॥ समेति बन्धुलोकोऽस्य यावद्दिष्ट्यामिवर्द्धकः । तावत्तद्यानमायातं छादयद्गगनं रुचा ॥१५३॥ अपृच्छत्तस्य वृत्तान्तमतृप्तश्च पुनः पुनः । उक्तं विद्याधरैस्तस्य यथावदतिविस्तरम् ॥१५४॥ ततो यानं समारुह्य समस्तैबन्धुभिः समम् । निमेषेण परिप्राप्तो विनीता तूर्यनादिताम् ॥१५५॥ अवतीर्याम्बरादाशु पुत्रमालिङ्ग्य निर्भरम् । सुखमीलितनेत्रोऽसौ क्षणं मूर्छामुपागतः ॥१५६॥ प्रवुध्य च विशालेन चक्षुषा वाष्पवारिणा । आसेचनकमैक्षिष्ट तनयं पाणिना स्पृशन् ॥१५७॥ माता तं मूर्छिता दृष्ट्वा परिष्वज्य प्रबोधिनी । आचक्रन्द सुकारुण्यं तिरश्चामपि कुर्वतो ॥१५॥ परिवनमवं च चक्र पुत्रक हा कथम् । हृतोऽसि जातमात्रस्त्वं केनाप्युत्तमवैरिणा ॥१५९॥ त्वदीक्षाचिन्तया देहो दग्धोऽयं वह्नितुल्यया। भवदर्शनतोयेन चिरान्निर्वापितोऽद्य मे ॥१६॥ धन्या पुष्पवती सुस्त्री या तेऽङ्गानि शैशवे । क्रीडता धूसराण्यके निहितानि सुचुम्बितम् ॥१६॥ चन्दनेन विलिप्तस्य कुमस्थासकाञ्चितम् । दधतः शेशवं दृष्टं कौमारं ते तया वपुः ॥१६२॥ नेत्राभ्यामस्रमुत्सृज्य स्तनाभ्यां च पयश्चिरम् । सुपुत्रसङ्गमानन्दं विदेहा परमं गता ॥१६३॥ जागृत दशामें होनेवाला प्रत्यक्ष ज्ञान है, आओ, आओ मैं तुम्हारा आलिंगन करूँ ॥१५०|| इतना कहकर आनन्दके आँसुओंसे जिनके नेत्रोंकी पुतलियाँ चंचल हो रही थीं ऐसे राजा जनकने उस पत्रवाहक विद्याधरका ऐसा आलिंगन किया मानो साक्षात् पुत्र ही आ गया हो ॥१५१।। उन्होंने इस हर्षसे नृत्य करते हुए की तरह उस विद्याधरके लिए अपने शरीरपर स्थित समस्त वस्त्राभूषण दे दिये । शरीरपर केवल उतने ही वस्त्र शेष रहने दिये जिससे कि वे नग्न न दिखें ॥१५२।। हर्षकी वृद्धि करनेवाले राजा जनकके बन्धुवर्ग जबतक इकट्ठे होते हैं तबतक अपनी कान्तिसे आकाशको आच्छादित करता हुआ भामण्डलका विमान वहाँ आ पहुँचा ॥१५३॥ राजा जनकने अतृप्त हो बार-बार भामण्डलका वृत्तान्त पूछा और विद्याधरोंने सब वृत्तान्त ज्योंका-त्यों बड़े विस्तारसे कहा ।।१५४॥ तदनन्तर राजा जनक समस्त भाई-बन्धुओंके साथ विमानपर आरूढ़ हो निमेष मात्रमें अयोध्या जा पहुंचे। उस समय अयोध्या तुरहीके मधुर शब्दसे शब्दायमान हो रही थी ॥१५॥ आकाशसे शीघ्र ही उतरकर उन्होंने पुत्रका गाढ़ आलिंगन किया। आलिंगनजन्य सुखसे उनके नेत्र निमीलित हो गये और क्षण भर के लिए वे मूर्छाको प्राप्त हो गये ॥१५६।। सचेत होनेपर उन्होंने जिनसे अश्रु-जल झर रहा था ऐसे विशाल लोचनोंसे तृप्तिकर पुत्रका अवलोकन किया तथा हाथसे उसका स्पर्श किया ।।१५७।। माता विदेहा भी पुत्रको देखकर तथा आलिंगन कर हर्षातिरेकसे मूच्छित हो गयी और सचेत होनेपर ऐसा रुदन करने लगी कि जिससे तिर्यंचोंको भी दया उत्पन्न हो रही थी ॥१५८। वह विलाप करने लगी कि हाय पुत्र! तू उत्पन्न होते ही किसी विकट वैरीके द्वारा क्यों अपहृत हो गया था ? ॥१५९|| मेरा यह शरीर अग्निके समान तेरे देखनेको चिन्तासे अब तक जलता रहा है। आज चिरकालके बाद तेरे दर्शनरूपी जलसे शान्त हुआ है ॥१६०॥ पुष्पवती बड़ी ही धन्य और भाग्यशालिनी उत्तम स्त्री है जिसने कि बाल्य अवस्थामें क्रीड़ासे धूलधूसरित तेरे अंग अपनी गोदमें रखे हैं तथा चन्दनसे लिप्त और केशरके तिलकसे सुशोभित तेरे मुखका चुम्बन किया है एवं शैशव अवस्थाको धारण करनेवाले तेरे कुमारकालीन शरीरको देखा है ।।१६१-१६२।। माता विदेहाके नेत्रोंसे आँसू और स्तनोंसे चिरकाल तक दूध निकलता रहा । १. वृत्तमिवा-म.। २. यावद्विद्याभिवर्धकः म.। ३. तूर्यनोदितां ख.। ४. 'तदासेचनकं तृप्तेर्नास्त्यन्तो Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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