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________________ पद्मपुराणे ततः स्वयंवरोदन्तं श्रुत्वा भामण्डलो हिया। विषादेन च संपूर्णः कृच्छ चिन्तान्तरं गतः ॥२५॥ निरर्थकमिदं जन्म विद्याधरतया समम् । यतः प्राकृतवत् कश्चिन्न संप्राप्तोऽस्मि तां प्रियाम् ॥२६॥ ईर्ष्याक्रोधपरीतश्च सभामाह हसन्नसौ। कावः खेचरता' भीतिं भजतां भूमिगोचरात् ॥२७॥ आनयाम्येष सत्कन्यां स्वयं निर्जित्य भूचरान् । न्यासापहारिणां कुर्वे यक्षाणां च विनिग्रहम् ॥२८॥ इत्युक्त्वासौ सुसन्नह्य विमानी वियदुद्गतः । पुरकाननसंपूर्ण पृथिवीतलमैक्षत ॥२९॥ ततो दृष्टिगता तस्य विदग्धविषये क्रमात् । महीध्रसंकटे रम्ये नगरे चारमसेविते ॥३०॥ दृष्टं मया कदाप्येतदिति चिन्तामुपागतः । जातिस्मरत्वमासाद्य समवाप्य स मूर्छनम् ॥३१॥ पितुरन्ते ततो नीतः सचिवैराकुलात्मकैः । चन्दनद्रवसिक्ताङ्गः प्रमदाभिः प्रबोधितः ॥३२॥ अन्योन्यं दत्तनेत्रं च हसित्वा तामिरौच्यत । कुमार युक्तमेतत्ते कातरत्वमनुत्तमम् ॥३३॥ अदृष्ट्वावनिचर्यार्थ निश्शेषरहितत्रपः । गुरूणामग्रतो मोहं यत्प्राप्तोऽसि विचक्षण ॥३४॥ भज खेचरनाथानां कन्या देव्यधिकप्रभाः। जनजल्यनकं व्यथ वृत्तं सुन्दर मा कृथाः ॥३५॥ ततोऽसावब्रवीदेवं ब्रीडाशोकनताननः । धिग्मया घनमोहेन विरुद्ध चिन्तितं महत् ॥३६॥ नोचानामपि नात्यन्तमीदृशं कर्म युज्यते । अहो कर्मभिरत्यथमशुभैरमिचेष्टितः ॥३७॥ एकस्मिन्नुषितः कुक्षी क्वापि सार्धमहं तया । दुष्कर्मविगमाज्ज्ञाता कथंचित् साधुना मया ॥३८॥ ततस्तं शोकमारेण पीडितं चन्द्रविक्रमः । अङ्कमारोप्य चुम्बित्वा पप्रच्छ पुरुविस्मयः ॥३९॥ तदनन्तर स्वयंवरका वृत्तान्त सुनकर भामण्डल लज्जा और विषादसे युक्त होता हुआ दुःखसाथ यह विचार करने लगा कि ॥२५॥ अहो! मेरा यह विद्याधर जन्म निरर्थक है कि जिससे मैं साधारण मनुष्यकी तरह उस प्रियाको प्राप्त नहीं कर सका ॥२६।। ईर्ष्या और क्रोधसे यक्त होकर उसने हँसते हए सभासे कहा कि जब आप लोग भमिगोचरीसे भी भय रखते हो तब आपका विद्याधर होना किस कामका ? ॥२७।। मैं भूमिगोचरियोंको जोतकर स्वयं ही उस उत्तम कन्याको ले आता हूँ तथा धनुषरूपी धरोहरका अपहरण करनेवाले यक्षोंका निग्रह करता हूँ ॥२८॥ ऐसा कहकर वह तैयार हो विमानमें बैठकर आकाशमें जा उड़ा । वहाँसे उसने पुर और वनसे भरा पृथ्वीतल देखा ||२९|| तदनन्तर उसकी दृष्टि अनेक पर्वतोंसे युक्त विदग्ध नामक देशमें अपने पूर्वभवके मनोहर नगरपर पड़ी ॥३०॥ यह नगर मैंने कभी देखा है-इस प्रकार चिन्ता करता हुआ वह जातिस्मरणको प्राप्त होकर मूच्छित हो गया ॥३१।। तदनन्तर घबड़ाये हुए मन्त्री उसे पिताके समीप ले आये। वहाँ स्त्रियोंने चन्दनके द्रवसे उसका शरीर सींचकर उसे सचेत किया ।।३२॥ स्त्रियोंने परस्पर नेत्रका इशारा कर तथा हँसकर उससे कहा कि हे कुमार ! तुम्हारी यह कातरता अच्छी नहीं ।।३३।। जो तुम बुद्धिमान् होकर भी भूचर्याका समस्त प्रयोजन बिना देखे ही गुरुजनोंके आगे इस तरह मोहको प्राप्त हुए हो ॥३४॥ देवियोंसे भी अधिक कान्तिको धारण करनेवाली विद्याधर राजाओंकी अनेक कन्याएँ हैं सो उन्हें तुम प्राप्त होओ। हे सुन्दर ! इस तरह व्यर्थ ही लोकापवाद मत करो ॥३५॥ तदनन्तर लज्जा और शोकसे जिसका मुख नीचा हो रहा था ऐसे भामण्डलने इस प्रकार कहा कि मुझे धिक्कार हो, जो मैंने तीव्र मोहमें पड़कर इस प्रकार विरुद्ध चिन्तवन किया ॥३६॥ ऐसा कार्य तो अत्यन्त नीच कुलवालोंको भी करना उचित नहीं है। अहो, मेरे अत्यन्त अशुभ कर्मोंने कैसी चेष्टा दिखायी ? ॥३७|| मैंने उसके साथ एक ही उदरमें शयन किया है। आज पापकर्मका उदय मन्द हुआ इसलिए किसी तरह उसे जान सका हूँ ॥३८॥ तदनन्तर शोकके भारसे पीड़ित भामण्डलको गोदमें रखकर बहुत भारी आश्चर्यसे भरा चन्द्रगति चुम्बन कर पूछने लगा १. वाचः खेचरता (?) म.। २. तत्परो भूत्वा । ३. रहितं नयः म.। ४. विचक्षणः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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