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________________ एकोनविंशत्तमं पर्व अङ्गनाजनदृष्टीनां मनसा स महास्थिरम् । आलानमेतदासीन्मे शरीरं चारुविभ्रमम् ॥५७॥ लालितं परमैनॊगैः प्रसादेन पितुस्तव । विसंघटितभेतन्मे कुमित्रमिव सांप्रतम् ॥५८॥ अधत्त यः पुरा शक्तिं रिपुदारणकारिणीम् । करेण यष्टिमालम्ब्य तेन भ्राम्यामि साम्प्रतम् ॥५९॥ विक्रान्तपुरुषाकृष्टशरासनसमं मम । पृष्ठास्थिस्थितमाक्रान्ते मूनि मृत्योरिवाघ्रिणा ॥६॥ दन्तस्थानभवा वर्णाश्चिरं क्वापि गता मम । ऊपमवर्णोष्मणा तापमशता इव सेवितुम् ॥६१॥ आलम्बे यदि नो यष्टिमेतां प्राणगरीयसीम् । क्षिती पतेत्ततः पक्कमिदं हतशरीरकम् ॥६२॥ वलीनां वर्तते वृद्धिरुत्साहस्य परिक्षयः । राजन् श्वसिमि देहेन यदेतेन तदद्भुतम् ॥६३॥ 'अद्यश्वीनममुं कायं जरया जर्जरीकृतम् । नाथ धतु न शक्नोमि बाह्य वस्तुनि का कथा ॥६४॥ नितान्तपटुताभाझि हृषीकाणि पुरा मम । संप्रत्युद्देशमात्रेण स्थितानि जडचेतसः ॥६५॥ पदमन्यत्र यच्छामि पतत्यन्यत्र दुर्घटम् । श्याममेवाखिलं दृष्ट्या पश्यामि धरणीतलम् ॥६६॥ गोत्रक्रमसमायातमिदं राजकुलं मम । यतः शक्नोमि न त्यक्तुमपि प्राप्येदशी दशाम् ॥६॥ पक्वं फलमिवैतन्मे शरीरं क्वापि वासरे। नेष्यत्याहारतां मृत्युर्मर्मरच्छदनोपमाम् ॥६८॥ न तथासन्नमृत्योर्मे स्वामिन् संजायते भयम् । भवञ्चरणसंसेवाविरहाद माविनो यथा ॥६९॥ व्याक्षेपो मे कुतः कश्चिद्दधतस्तनुमीदृशीम् । भवदाज्ञा प्रतीक्ष्यैव यस्य जीवितकारणम् ॥७॥ बल था कि जिससे मैं राजाको भी तृणके समान तुच्छ समझता था ॥५६॥ अत्यन्त स्थविर और सुन्दर विलाससे युक्त मेरा यह शरीर स्त्रीजनोंकी दृष्टि और मनको बांधने के लिए आलानके समान था ॥५७|| आपके पिताके प्रसादसे मैंने इस शरीरका उत्तमोत्तम भोगोंसे लाड-प्यार किया था पर इस समय कुमित्रके समान यह विघट गया है ।।५८|| मेरा जो हाथ पहले शत्रुओंको विदारण करनेकी शक्ति रखता था अब उसी हाथसे लाठी पकड़कर चलता हूँ ॥५९|| मेरी पीठकी हड्डी शूरवीर मनुष्यके द्वारा खींचे हुए धनुषके समान झुक गयी है और मेरा शिर यमराजके पैरसे आक्रान्त हुएके समान नम्र हो गया है ।।६०॥ दाँतोंके स्थानसे उच्चरित होनेवाले मेरे वर्ण (लू तवर्ग ल और स ) कहीं चले गये हैं सो ऐसा जान पड़ता है मानो ऊष्मवर्णों (श ष स ह ) की ऊष्मा अर्थात् गरमीसे उत्पन्न सन्तापको सहने में असमर्थ होकर ही कहीं चले गये हैं ॥६१।। यदि मैं प्राणोंसे भी अधिक प्यारी इस लाठीका सहारा न लेॐ तो यह पका हुआ अधम शरीर पृथ्वीपर गिर जावे ॥६२॥ शरीरमें बलि अर्थात् सिकुड़नोंकी वृद्धि हो रही है और उत्साहका ह्रास हो रहा है। ह राजन् ! इस शरीरसे मैं साँस ले रहा हूँ यही आश्चर्यकी बात है ॥६३|| हे नाथ ! आजकलमें नष्ट हो जानेवाले इस जराजर्जरित शरीरको ही धारण करनेके लिए मैं समर्थ नहीं हूँ फिर दूसरी बाह्य वस्तुकी तो कथा ही क्या है ? ॥६४॥ पहले मेरी इन्द्रियाँ अत्यन्त सामर्थ्यको प्राप्त थीं पर इस समय नाममात्रको ही स्थित हैं। मेरा मन भी जड़रूप हो गया है ॥६५।। पैर अन्य स्थानपर रखता हूँ पर सँभल नहीं सकनेके कारण अन्य स्थानपर जा पड़ता है। मैं समस्त पृथ्वीतलको अपनी दृष्टिसे काला ही काला देखता हूँ ।।६६।। चूँकि यह राजकुल मेरी वंश-परम्परासे चला आ रहा है इसलिए ऐसी दशाको प्राप्त होकर भी इसे छोड़नेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥६७॥ मेरा यह शरीर पके हुए फलके समान है सो यमराज सखे पत्रके समान इसे अपना आहार बना लेगा ।।६८|| हे स्वामिन् ! मुझे निकटवर्ती मृत्युसे वैसा भय नहीं उत्पन्न होता है जैसा कि भविष्यमें होनेवाली आपके चरणोंकी सेवाके अभावसे हो रहा है ॥६९॥ आपकी सम्माननीय आज्ञा ही जिसके जीवित रहनेका कारण है ऐसे इस शरीरको धारण करते हुए मुझे विलम्ब अथवा कार्या१. अद्य श्वो भवम् अद्यश्वीनं भङ्गरमित्यर्थः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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