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________________ अष्टाविंशतितमं पर्व अचिन्तयच्च ते नूनमेते विद्याभृतो जनाः । विजया गिरेरूध्वं ये वसन्तीति मे श्रुतम् ॥१०५॥ मध्येऽयमस्य सैन्यस्य स्वविमानकृतस्थितिः । शोमते परमो दीप्त्या कोऽपि विद्याधराधिपः ॥१०६।। एवं चिन्तापरे तस्मिन्नृपतौ दैत्यपुङ्गवः । संप्रापच्चैत्यभवनं सम्मदो नतविग्रहः ।।१०७।। दृष्टा दैत्याधिपं प्राप्त भीमसौम्यपरिग्रहम् । जनकः किमपि ध्यायंस्तस्थौ सिंहासनान्तरे ॥१०॥ भक्त्या शशाङ्कयानोऽपि कृत्वा पूजामनुत्तमाम् । प्रणम्य विधिना चक्रे जिनानां परमस्तुतिम् ॥१०॥ "विपञ्चों च विधायाङ्के सुखरूपां प्रियामिव । महाभावनया युक्तो जगौ जिनगुणात्मकम् ॥११०॥ चतुष्पदिकावृत्तम् त्रिभुवनवरदमभिष्टुतमतिशयपूजाविधानविनिहितचित्तैः । प्रणतं सुरवृषभगणः प्रणमत नाथं जिनेन्द्र मक्षयसौख्यम् ।।१११।। ऋषभं सततं परमं वरदं मनसा वचसा शिरसा सुननाः। भजत प्रवरं विलयं प्रगतं विहितं सकलं दुरितं भवति ॥११२॥ अतिशयपरमं विनिहतदुरितं परमगतिगतं नमत जिनवरम् । सर्वसुरासुरपूजितपादं क्रोधमहारिपुनिर्मितमङ्गम् ।।११३॥ उत्तमलक्षणलक्षितदेहं नौमि जिनेन्द्रमहं प्रयतात्मा। भक्त्या विनमितसर्वजनौघं नतिमात्रविनाशितमक्तमयम् ॥११४॥ वाहनोंपर स्थित पुरुषोंके मध्यमें एक विमान देखा ॥१०४॥ उसे देखकर वह विचार करने लगा कि निश्चय ही वे विद्याधर हैं जो कि विजयार्द्ध पर्वतपर वास करते हैं ।।१०५।। इस सेनाके बीच में अपने विमानमें बैठा हआ जो कान्तिमान पुरुष शोभित हो रहा है वह विद्याधरोंका राजा है॥१०६॥ राजा जनक इस प्रकारको चिन्तामें तत्पर थे ही कि हर्षसे भरा तथा नम्रीभत श रीरको धारण करनेवाला वह चन्द्रगति जिनमन्दिरमें आ पहुंचा ॥१०७॥ जिसका परिग्रह कुछ तो भीम अर्थात् भय उत्पन्न करनेवाला था और कुछ सौम्य अर्थात् शान्ति उत्पन्न करनेवाला ऐसे दैत्यराजको आया देख कुछ ध्यान करता हुआ राजा जनक जिनराजके सिंहासनके नीचे बैठ गया ।।१०८॥ राजा चन्द्रगतिने भी भक्तिवश उत्तम पूजा कर तथा विधिपूर्वक प्रणाम कर जिनेन्द्रदेवकी उत्तम स्तुति की ।।१०९|| और प्रियाके समान जिसका स्वर अत्यन्त सुखकारी था ऐसी वीणाको गोदमें रख बड़ी भावनासे युक्त हो जिनराजका गुणगान करने लगा ॥११०॥ गुणगान करते समय उसने कहा कि जो तीनों लोकोंके लिए वर देनेवाले हैं, अतिशयपूर्ण पूजाके करनेमें चित्त धारण करनेवाले मनुष्य जिनकी सदा स्तुति करते हैं, इन्द्रादि श्रेष्ठ देव जिन्हें नमस्कार करते हैं, तथा जो अक्षय-अविनाशी सुखके धारक हैं, ऐसे जिनेन्द्रदेवको हे भव्यजन! सदा प्रणाम करो ॥१११॥ हे सत्पुरुषो! तुम उन ऋषभदेव भगवान्को मनसे, वचनसे शिर झुकाकर सदा नमस्कार करो जो कि उत्कृष्ट लक्ष्मीसे युक्त हैं, वर देनेवाले हैं, श्रेष्ठ हैं, अविनाशी हैं और उत्तम ज्ञानसे युक्त हैं तथा जिन्हें नमस्कार करनेसे समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं ॥११२॥ तुम उन जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार करो जो कि अतिशयोंसे उत्कृष्ट हैं, जिन्होंने पापको नष्ट कर दिया है, जो परमगति-सिद्ध गतिको प्राप्त हो चुके हैं, समस्त सुर और असुर जिनके चरणोंकी पूजा करते हैं, तथा जिन्होंने क्रोधरूपी महाशत्रुको पराजित कर दिया है ।।११३।। मैं भक्तिपूर्वक बड़ी सावधानीसे उन जिनेन्द्र भगवान्की स्तुति करता हूँ कि जिनका शरीर उत्तम लक्षणोंसे युक्त है, जिन्होंने समस्त मनुष्योंके समूहको नम्रीभूत कर दिया है और जिन्हें नमस्कार १. विद्याधरा म. । २. मध्ये + अयम् + अस्य । ३. हर्षयुक्तः । ४. नम्रशरीरः । ५. वीणाम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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