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________________ चतःषष्टितमं पर्व ४०३ विद्यया पर्णलव्याऽसौ पुनर्वसुनियुक्तया । अटवीमागता स्वैरं नाम्ना श्वापदरौरवाम् ॥५५॥ महाप्रतिमयाकारां महाविद्याभृतामपि । दुःप्रवेशां कृतध्वान्तां महाविटपसंकटैः ॥५६।। नानावल्लीसमाश्लिष्टविविधोत्तुङ्गपादपाम् । पल्लवोद्वासितैमुना भीतैरिव रवेः करैः ॥५॥ तरक्षुशरमहीपिव्याघ्रसिंहादिसेविताम् । उच्चावचखरक्षोणीं महाविवरसंगताम् ॥५८॥ अरण्यानीं गता सेयं महामयसमागता । कान्ता शिखेव दीपस्य सीदति स्म वराकिका ॥५९॥ नदीतीरं समागम्य कृत्वा दिगवलोकनम् । महाखेदसमायुक्ता स्मृतबन्धुः स्म रोदिति ॥६॥ तेनाहं लोकपालेन देवेन्द्रप्रतिभासिना । सुचक्रवर्तिना जाता महादुर्ललितात्मिका ॥६॥ विधिना वारुणेनेमामवस्थामनुसारिता । किं करोमि परिप्राप्ता वनं दुःखनिरोक्षणम् ॥६२॥ हा मात सकलं लोकं त्वं पालयसि विक्रमी । कथं मामपरित्राणां विपिने नानुकम्पसे ॥६३॥ हा मातस्तादृशं दुःखं कुक्षिवारणपूर्वकम् । विषय सांप्रतं कस्मात् कुरूपे नानुकम्पनम् ॥४॥ हा मेऽन्तःकरणच्छायपरिवर्गगुणोत्तम । अमुक्तां क्षणमप्येकं कथं त्यजसि सांप्रतम् ॥६५॥ जातमात्रा मृता नाऽहं कस्माद्दुःखस्य भूमिका । अथवा न विना पुण्यैरभिवान्छितमाप्यते ॥६६॥ किं करोमि व गच्छामि दुःखिनी संश्रयामि कम् । कं पश्यामि महाऽरण्ये कथं तिष्यामि पापिनी ॥६॥ स्वप्नः किमेष संप्राप्तं जन्मेदं नरके मया । सैव किं स्यादहं कोऽयं प्रकारः सहसोद्गतः ॥६॥ एवमादि चिरं कृत्वा विप्रलापं सुविहला । पशूनामपि तीव्राणां मनोद्रवणकारणम् ॥६९॥ ऐसे उस पुनर्वसुने कन्याको विमानसे छोड़ दिया जिससे वह चन्द्रमाको शरद्कालीन कान्तिके समान आकाशसे नीचे गिरी ।।५४॥ पुनर्वसुके द्वारा नियुक्त की हुई पर्णलध्वी नामक विद्याके सहारे स्वेच्छासे उतरती हई वह श्वापद नामक अटवीमें आयी ॥५५॥ तदनन्तर जो बड़े-बड़े विद्याधरों के लिए भी भय उत्पन्न करनेवाली थी, जिसमें प्रवेश करना कठिन था, बड़े-बड़े वृक्षोंको सघन झाड़ियोंसे जिसमें अन्धकार फैल रहा था, जहाँ विविध प्रकारके ऊंचे वृक्ष नाना लताओंसे आलिगित थे, पल्लवोंकी सघन छायासे दूर की हुई सूर्यके किरणोंने भयभीत होकर ही मानो जिसे छोड़ दिया था, जो भेड़िये, शरभ, चीते, तेंदुए तथा सिंहों आदिसे सेवित थी, जहांकी कठोर भूमि ऊंची-नोची थी, और जो बड़े-बड़े बिलोंसे सहित थी ऐसी उस महाअटवीमें जाकर महाभयको प्राप्त हई बेचारी अनंगसेना दीपककी शिखाके समान कॉपने लगी ॥५६-५९॥ नदोके तीर आकर और सब दिशाओंको ओर देख महाखेदसे युक्त होती हुई वह कुटुम्बीजनोंको चितार-चितारकर रोने लगी ॥६०। वह कहती थी कि हाय मैं लोककी रक्षा करनेवाले, इन्द्र के समान सुशोभित उन चक्रवर्ती पितासे उत्पन्न हुई और महास्नेहसे लालित हुई। आज प्रतिफूल देवसे-भाग्यको विपरीततासे इस अवस्थाको प्राप्त हुई हूँ। हाय, जिसका देखना भी कठिन है ऐसे इस वनमें आ पड़ी हूँ क्या करूं ? ॥६१-६२॥ हाय पिता ! तुम तो महापराक्रमी, सब लोककी रक्षा करते हो फिर वनमें असहाय पड़ी हुई मुझपर दया क्यों नहीं करते हो ? ॥६३॥ हाय माता! गर्भ धारणका वैसा दुःख सहकर इस समय दया क्यों नहीं कर रही हो ? १६४।। हाय मेरे अन्तःकरणके समान प्रवृत्ति करनेवाले तथा उत्तम गुणोंसे युक्त परिजन ! तुमने तो मुझे एक क्षण के लिए भी कभी नहीं छोड़ा फिर इस समय क्यों छोड़ रहे हो? ॥६५।। मैं दुखिया क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किसका आश्रय लूँ ? किसे देखू और इस महावन में मैं पापिनी कैसे रहूँ ? ॥६६॥ क्या यह स्वप्न है ? अथवा नरकमें मेरा जन्म हुआ है ? क्या मैं वही हूँ अथवा यह कौन-सी दशा सहसा प्रकट हुई है ? ॥६७-६८।। इस प्रकार चिरकाल तक विलापकर वह अत्यन्त विह्वल हो गयी। उसका वह विलाप क्रूर पशुओंके भी मनको पिघला देने वाला १. हा मातः करणच्छायपरिवर्ग गुणोत्तमाम म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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