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________________ ३४२ पद्मपुराणे सशब्दैरायतैः स्थूलैबद्धो रज्जुभिरायसैः' । ग्रीवायां हस्तपादे च रेणुरूक्षितविग्रहः ॥२५॥ वेष्टितः किङ्करैः क्रूरैम्यितां च गृहे गृहे । हास्यमानः खरैर्वाक्यैः कृतमण्डलपूत्कृतः ॥२५९॥ इमकं वनिता दुष्वा नराश्च पुरवासिनः । शोचन्ति कृतधिक्कारा विकृता कम्मिताननाः ॥२६॥ क्षितिगोचरदूतोऽयं सोऽयं दूतः प्रपूजितः । पश्यतैनमिति स्वानः पुरे सर्वत्र घोष्यताम् ।।२६१॥ ततस्तैर्विविधाक्रोशः संप्राप्तः कोपमुत्तमम् । अयासीद् बन्धनं छित्वा मोहपाशं यथा यतिः ॥२६२॥ पादविन्यासमात्रेण मङ्क्त्वा गोपुरमुन्नतम् । द्वाराणि च तथान्यानि खमुत्पत्य ययौ मुदा ॥२६३॥ शक्रप्रासादसंकाशं भवनं रक्षसां विमोः। हनूमत्पादघातेन विस्तीर्ण स्तम्मसंकुलम् ॥२६४।। पतता वेश्मना तेन यन्त्रितापि महानगैः । धरणी कम्पमानौता पादवेगानुपाततः ॥२६५।। भूमिसंप्राप्तसौवर्णप्राकारं रन्ध्रगह्वरम् । वज्रचूर्णितशेलाभं जातं दाशमुखं गृहम् ।।२६६॥ कपिमौलिभृतामीशं श्रुत्वैवंविधविक्रमम् । प्रमोदं जानकी प्राप्ता विषादं च मुहुर्मुहुः ॥२६७॥ वज्रोदरी ततोऽवोचत् किं वृथा देवि रोदिषि । संत्रोव्य शृङ्खलं पश्य यातं मारुतिमम्बरम् ।।२६८।। निशम्य वचनं तस्या विकसन्नेत्रपङ्कजा । गच्छन्तं मारुतिं दृष्ट्वा निजसैन्यसमागतम् ॥२६९।। अचिन्तयदयं वातां मह्यं नाथस्य मे ध्रवम् । कथयिष्यति यस्यैष गच्छतः प्रवरो जवः ॥२७॥ पृष्टतश्चास्य सानन्ता पुष्पाञ्जलिममञ्चत । समाधानपरा भूत्वा श्रीरिवेशस्य तेजसाम् ।।२७१॥ उवाच च ग्रहाः सर्वे भवन्तु सुखदास्तव । हतविघ्नश्चिरंजीव भोगवान् वायुनन्दन ॥२७२।। शब्द करनेवाली लम्बी मोटी लोहेकी सांकलोंसे इसे गरदन तथा हाथों और पैरोंमें कसकर बांधा जाये, धूलिसे इसकी शरीर धूसर किया जाये, दुष्ट किंकर इसे घेरकर कठोर वचनोंसे इसकी हंसी करें तथा घर-घर घुमावें । इस दुर्दशासे यह रो उठेगा ॥२५८-२५९।। इसे देख स्त्रियाँ तथा नगरके लोग धिक्कार देते तथा मुखको विकृत और कम्पित करते हुए इसके प्रति शोक प्रकट करेंगे ॥२६०|| इसके आगे-आगे नगरमें सर्वत्र यह घोषणा की जाये कि यह वही सम्मानको प्राप्त हुआ भूमिगोचरीका दूत है इसे सब लोग देखें ॥२६१॥ तदनन्तर उन विविध प्रकारके अपशब्दोंसे परम क्रोधको प्राप्त हुआ हनुमान् बन्धनको छेदकर उस प्रकार चला गया जिस प्रकार कि यति मोहरूपी पाशको छेदकर चला जाता है ॥२६२॥ वह पैर रखने मात्रसे उन्नत गोपुर तथा अन्य दरवाजोंको तोड़कर हर्षपूर्वक आकाशमें जा उड़ा ॥२६३।। रावणका जो भवन इन्द्रभवनके समान था वह हनुमान्के पैरकी आघातसे इस प्रकार बिखर गया कि उसमें खाली खम्भे-ही-खम्भे शेष रह गये ।।२६४।। यद्यपि वहाँकी पृथिवी बड़े-बड़े पर्वतोंसे जकड़ी हुई थी तथापि चरणोंके वेगके अनुघातसे गिरते हुए उस भवनके द्वारा हिल उठी ।।२६५।। जिसका स्वर्णमय कोट भूमिमें मिल गया था तथा जिसमें अनेक गहरे गड्ढे हो गये थे ऐसा रावणका घर वज्रसे चूर-चूर हुए पर्वतके समान हो गया ।।२६६।। मुकुटमें कपिका चिह्न धारण करनेवाले वानरवंशियोंक राजा हनुमान्को इस प्रकारका पराक्रमी सुन सीता हर्षको प्राप्त हई तथा बन्धनका समाचार सुन बार-बार विषादको प्राप्त हईं ॥२६७।। तदनन्तर पासमें बैठी हई वज्रोदरीने कहा कि हे देवि ! व्यर्थ ही क्यों रुदन करती हो? देखो, वह हनुमान बन्धन तोड़कर आकाशमें उड़ा जा रहा है ।।२६८।। उसके उक्त वचन सुन तथा अपनी सेनाके साथ हनुमान्को जाता देख सीताके नयनकमल खिल उठे ॥२६९|| वह विचार करने लगी कि जिसका जाते समय यह तीव्र वेग है ऐसा यह हनुमान् अवश्य ही मेरे लिए मेरे नाथको वार्ता कहेगा ।।२७०।। इस प्रकार विचारकर सावधान चित्त को धारक सीताने हर्षपूर्वक हनुमान्के पीछे उस प्रकार पुष्पांजलि छोड़ो जिस प्रकार कि लक्ष्मा तेजके स्वामीके पीछे छोड़तो है ।।२७१।। साथ ही उसने १. रायतैः म. । २. कृताधिकारा म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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