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________________ अष्टचत्वारिंशत्तमं पर्व २९५ तस्यां सिद्धान्नमस्कृत्य शिरस्थंकरकुड्मलाः । मक्त्या प्रदक्षिणं चक्रुः क्रमेण विधिपण्डिताः ।।१९७॥ ततः परिकरं बद्ध्वा सौमित्रिविनयं वहन् । नमस्कारपरो भक्तः स्तुति कतु समुद्यतः ।।१९८॥ जयशब्दं समुद्घोष्य प्रहृष्टा वानरध्वजाः । स्तोत्रं परिपठन्तीदमुत्तमं सिद्धमङ्गलम् ॥१९॥ स्थितांजैलोक्यशिखरे स्वयं परममास्वरे । स्वरूपभूतया स्थित्या पुनर्जन्मविवर्जितान् ॥२०॥ भवार्णवसमुत्तीर्णान्निःश्रेयसेसमुद्भवान् । आधारान्मुक्तिसौख्यस्य केवलज्ञानदर्शनान् ॥२०॥ अनन्तवीर्यसंपन्नान् स्वभावसमवस्थितान् । सुसमीचीनतायुक्तान्निःशेषक्षीणकर्मणः ॥२०॥ अवगाहनधर्मोक्तानमूर्तान् सूक्ष्मतायुजः । गुरुत्वलघुतामुक्कानसंख्यातप्रदेशिनः ॥२०३॥ अप्रमेय गुणाधारान् क्रमादिपरिवर्जितान् । साधारणान् स्वरूपेण स्वार्थकाष्टामुपागतान् ॥२०४॥ साथा शुद्धभावांश्च ज्ञातज्ञेयान्निरंजनान् । दग्धकर्ममहाकक्षान् विशुद्धध्यानतेजसा ॥२०५॥ तेजःपटपरीतेन मक्तितो वज्रपाणिना । संस्तुतान् मवमीतेन चक्रवादिमिस्तथा ॥२०६॥ संसारधर्मनिर्मुन्नान् सिद्धधर्मसमाश्रितान् । सर्वान् वन्दामहे सिद्धान् सर्वसिद्धिसमावहान् ।।२०७॥ अस्यां च ये गताः सिद्धिं शिलायां शीलधारिणः । उपगीताः पुराणेषु सर्वकर्मविवर्जिताः ॥२०८॥ जिनेन्द्रसमतां याताः कृतकृत्या महौजसः । मङ्गलस्मरणेनैतान मक्त्या वन्दामहे मुहुः ॥२०९॥ मनोहर जान पड़ती थी ।।१९६।। उस शिलासे जो सिद्ध हुए थे उन्हें नमस्कार कर जिन्होंने हाथ जोड़ मस्तकसे लगाये थे तथा जो सब प्रकारकी विधि-विधानमें निपुण थे ऐसे उन सब लोगोंने भक्तिपूर्वक क्रमसे उस शिलाकी प्रदक्षिणा दी ॥१९७|| तदनन्तर विनयको धारण करनेवाले, नमस्कार करने में तत्पर एवं भक्तिसे भरे लक्ष्मण कमर कस कर स्तुति करनेके लिए उद्यत हुए ॥१९८।। हर्षसे भरे वानरध्वज राजा, जय-जय शब्दका उच्चारण कर सिद्ध भगवान्के निम्नांकित स्तोत्रको पढ़ने लगे ।।१९९।। स्तोत्र पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि हम उन सिद्ध परमेष्ठियोंको नमस्कार करते हैं कि जो अतिशय देदीप्यमान तीन लोकके शिखरपर स्वयं विराजमान हैं, आत्माकी स्वरूपभूत स्थितिसे युक्त हैं तथा पुनर्जन्मसे रहित हैं ॥२००।। जो संसार सागरसे पार हो चुके हैं, परमकल्याणसे युक्त हैं, मोक्ष सुखके आधार हैं तथा केवलज्ञान और केवलदर्शनसे सहित हैं ॥२०१।। जो अनन्त बलसे युक्त हैं, आत्मस्वभावमें ' स्थित हैं, श्रेष्ठतासे युक्त हैं, और जिनके समस्त कर्म क्षीण हो चुके हैं ॥२०२॥ जो अवगाहन गुणसे युक्त हैं, अमूर्तिक हैं, सूक्ष्मत्व गुणसे सहित हैं, गुरुता और लघुतासे रहित तथा असंख्यातप्रदेशो हैं ।।२०३।। जो अपरिमित-अनन्तगुणोंके आधार हैं, क्रम आदिसे रहित हैं, आत्मस्वरूपकी अपेक्षा सब समान हैं और जो आत्म प्रयोजनको अन्तिम सीमाको प्राप्त हैं-कृतकृत्य हैं ।।२०४॥ जिनके भाव सर्वथा शुद्ध हैं, जिन्होंने जानने योग्य समस्त पदार्थों को जान लिया है, जो निरंजनकर्म कालिमासे रहित हैं और निर्मल ध्यान शक्लध्यानरूपी अग्निके द्वारा जिन्होंने कर्मरूपी महाअटवीको भस्म कर दिया है ।।२०५।। संसारसे भयभीत तथा तेजरूपी पटसे परिवृत इन्द्र तथा चक्रवर्ती आदि महापुरुष जिनकी स्तुति करते हैं ॥२०६॥ जो संसाररूप धर्मसे रहित हैं, सिद्धरूप धर्मको प्राप्त हैं तथा जो सब प्रकारकी सिद्धियोंको धारण करनेवाले हैं ऐसे समस्त सिद्ध परमेष्ठियोंको हम नमस्कार करते हैं ॥२०७|| शोलको धारण करनेवाले जो भी परुष सिद्धिको प्राप्त हुए हैं, पुराणोंमें जिनका कथन है, जो सर्व कर्मोंसे रहित हैं, जिनेन्द्र देवकी समानताको प्राप्त हुए हैं, कृतकृत्य हैं तथा जो महाप्रतापके धारक हैं उन सबको हम भक्तिपूर्वक मंगल स्मरण करते हुए बार-बार वन्दना करते हैं ॥२०८-२०९।। इस प्रकार चिरकाल तक स्तुति कर १. शिरसि करकुडमला: म.। २. निःश्रेयसः समुद्भवान् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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