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________________ वंशतितमं पर्व दृश्यते नेक्ष्यते भूयः पुनर्जात्वलोक्यते । पूर्वकर्मानुभावेन जाये रोदिषि किं वृथा ॥ १५८ ॥ व्रज स्वास्थ्यमिमं लेखं सुहृदो 'नाययाम्यहम् । वार्ता दशरथस्येमां परिवेदयितुं प्रिये ॥ १५९ ॥ स चाहं च सुतस्याशु करिष्यामि गवेषणम् । प्रच्छाद्य धरणीं सर्वां चरैः कुशलचेष्टितैः ॥ १६०॥ दयितां सान्त्वयित्वैवं लेखं मित्राय दत्तवान् । तं प्रवाच्य सशोकेन पूरितोऽतिगरीयसा ॥१६१ ॥ मह्यामन्वेषितस्ताभ्यां नासौ दृष्टो यदार्भकः । मन्दीकृत्य तदा शोकमस्थुः कृच्छ्रेण बान्धवाः ॥ १६२॥ नासावासीज्जनस्तत्र पुरुषः प्रमदाथवा । यो न वाष्पपरीताक्षस्तच्छोकेन वशीकृतः ॥ १६३॥ शोकविस्मरणे हेतुर्वभूव सुमनोहरा । जानकी बन्धुलोकस्य शुभशैशवचेष्टिता ॥ १६४ ॥ मालिनीवृत्तम् प्रमदमुपगतान योषितामङ्गदेशे पृथुतनुभवकान्त्या लिम्पती दिक्समूहम् । विपुलकमलयाता श्रीरिवासौ सुकण्ठा शुविहसितसितास्या वर्धताम्भोजनेत्रा ।। १६५॥ प्रभवति गुणसस्यं येन तस्यां समृद्धं Jain Education International भजदखिलजनानां सौख्य संभारदानम् । तदतिशय मनोज्ञा चारुलक्ष्मान्विताङ्गा जगति निगदितासौ भूमिसाम्येन सीता ॥१६६॥ वदन जितशशाङ्का पल्लवच्छायपाणिः शितिमणिसमतेजः केशसंघातरम्या । ४. ले गया है और निश्चित ही तुम उसे जीवित देखोगी ।। १५६ - १५७॥ इष्ट वस्तु पूर्वं कर्मके प्रभावसे अभी दिखती है फिर नहीं दिखती, तदनन्तर फिर कभी दिखाई देने लगती है । इसलिए हे प्रिये ! व्यर्थ ही क्यों रोती हो ? || १५८|| तुम स्वस्थताको प्राप्त होओ । हे प्रिये ! में यह समाचार बतलानेके लिए मित्र राजा दशरथके पास पत्र भेजता हूँ || १५९ || वह और में दोनों ही चतुर गुप्तचरोंसे समस्त पृथिवीको आच्छादित कर शीघ्र ही तेरे पुत्रकी खोज करेंगे || १६०|| इस प्रकार स्त्रीको सान्त्वना देकर उसने मित्रके लिए पत्र दिया । उस पत्रको बाँचकर राजा दशरथ अत्यधिक शोकसे व्याप्त हो गये || १६१ || उन दोनोंने पृथिवीपर पुत्रकी खोज की। पर जब कहीं पुत्र नहीं दिखा तब सब बन्धुजन शोकको मन्द कर बड़े कष्टसे चुप बैठ रहे || १६२ | | उस समय न कोई ऐसा पुरुष था और न कोई ऐसी स्त्री ही थी जिसके नेत्र पुत्रसम्बन्धी शोकके कारण अश्रुओंसे व्याप्त नहीं हुए हों ||१६३|| उस समय बन्धुजनोंका शोक भुलानेका कारण यदि कुछ था तो अत्यन्त मनोहर और शुभ बालचेष्टाओंको धारण करनेवाली जानकी ही थी || १६४ || १३ वह जानको हर्पको प्राप्त होनेवाली स्त्रियोंकी गोद में निरन्तर वृद्धिंगत हो रही थी । वह अपने शरीरकी विशाल कान्तिसे दिशाओंके समूहको लिप्त करती थी । वह विपुल कमलोंको प्राप्त लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, उसका कण्ठ सुन्दर था, पवित्र हास्य से उसका मुख शुक्ल हो रहा था और कमलके समान उसके नेत्र थे || १६५ || समस्त भक्तजनोंके लिए सुखका समूह प्रदान करनेवाला गुणरूपी धान्य, चूँकि उस जानकीमें अत्यन्त समृद्धिके साथ उत्पन्न होता था, अतः अत्यन्त मनोहर और उत्तम लक्षणोंसे युक्त उस जानकीको लोग भूमिकी समानता रखने के कारण सीता भी कहते थे || १६६ | | उसने अपने मुखसे चन्द्रमाको जीत लिया था, उसके १. नीययाम्यहम् म. । २. पाता म. । ३. सितमणि म । ४. शितमणिसमतेजाः ब. । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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