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________________ २६५ षट्चत्वारिंशत्तम पर्व हस्तं हस्तेन संस्पृश्य हन्ति पादेन मेदिनीम् । निश्वासदहनश्याममाकृष्याधरमीक्ष्यते ॥१८१॥ धत्ते कहकह स्वानं केशान् वर्त्तयति क्षणम् । कोपेन दुस्सहां दृष्टिं क्वचिदेव विमुञ्चति ॥१८२॥ ज़म्भोत्तानीकृतोरस्को वाष्पाच्छादितलोचनः । बाहुतोरणमुद्यम्य मिनत्ति स्फुटदङ्गुलिः ॥१८३॥ अंशुकान्तेन हृदय वीजयत्याहितेक्षणम् । कुसुमैः कुरुते रूपं पुनर्नाशयति द्रुतम् ॥१८४॥ चित्रयत्यादरी सीतां द्रवयत्यश्रमिः पुनः । दीनः क्षिपति हाकारान् न न मामेति जल्पति ॥१८५॥ एवमाद्याः क्रियाः क्लिष्टा मदनग्रहपीडितः । करोति करुणालापं चित्रं हि स्मरचेष्टितम् ।।१८६।। तस्य स्मराग्निना दीप्तं हृदयेन समं वपुः । अनुबन्धमहाधूपं ज्वलत्याशाकृतेन्धनम् ।।१८७।। अचिन्तयच्च हा कष्टं कामवस्थामहं गतः । येनेदमपि शक्नोमि न वोढुं स्वशरीरकम् ॥१८८॥ दुर्गसागरमध्यस्था बृहद्विद्याधरा मया । जिताः सहस्रशो युद्धे किमिदं वर्ततेऽधुना ॥१८९।। सर्वत्र जगति ख्यातलोकपालपरिच्छदः । वन्दीगृहमुपानीतो महेन्द्रोऽपि पुरा मया ॥१९॥ अनेकयुद्धनिर्भग्ननराधिपकदम्बकः । सोऽहं संप्रति मोहेन भस्मीकतु प्रवर्तितः ।।१९१॥ चिन्तयन्निदमन्यच्च कामाचार्यवशंगतः । आस्तां तावदसौ राजनिदमन्यद्विबुध्यताम् ॥१९२॥ आकुलो मन्त्रिभिः साकं महामन्त्रविशारदः । विभीषणः समारेभे निरूपयितुमीदशम् ॥१९३॥ स हि रावणराष्ट्रस्य धुरं धत्ते गतश्रमः । समस्तशास्त्रबोधाम्बुधौतनिर्मलमानसः ॥१९४॥ रखता, कभी उसे दूर फेंक देता, कभी बार-बार शृंगारका पाठ करता-शृंगार भरे शब्दोंका उच्चारण करता और कभी आकाशकी ओर देखने लगता था ॥१८०॥ कभी हाथसे हाथका स्पर्श कर पैरसे पृथिवीको ताड़ित करता था, कभी श्वासोच्छ्वासरूपी अग्निसे काले पड़े हुए अधरोष्ठको खींचकर देखता था ॥१८१॥ कभी 'कह-कह' शब्द करता था, कभी केशोंको खोलकर फैलाता था, कभी किसीपर क्रोधसे दुःसह दृष्टि छोड़ता था ॥१८२॥ कभी जिमुहाई लेते समय वक्षःस्थलको फुलाकर आगेको उभार लेता था, कभी नेत्रोंको आंसुओंसे आच्छादित करता था, कभी भुजाओंका तोरण ऊपर उठा अंगुलियां चटकाता हुआ उसे तोड़ता था ॥१८३।। कभी हृदयको ओर दृष्टि डालकर वस्नके अंचलसे हवा करता था, कभी फूलोंसे रूप बनाता और फिर उसे शीघ्र ही नष्ट कर देता था ॥१८४॥ कभी आदरके साथ सीताका चित्र बनाता और फिर उसे आंसओंसे गीला करता था, कभी दीनताके साथ हाहाकार करता और कभी 'न, न' 'मा, मा' शब्दोंका उच्चारण करता था ॥१८५।। इस प्रकार कामरूपी ग्रहसे पीडित रावण अनेक प्रकारकी चेष्टाएं करता तथा करुणापूर्ण वार्तालाप करता था सो ठीक ही है क्योंकि कामकी चेष्टा विचित्र होती है ।।१८६।। जिसमें वासनारूपी महाधूम उठ रहा था, तथा आशा जिसमें इंधन बन रही थी ऐसा उसका शरीर कामाग्निसे दीप्त हो हृदयके साथ जल रहा था ॥१८७।। वह कभी विचार करता कि हाय मैं किस अवस्थाको प्राप्त हो गया जिससे अपने इस शरीरको भी धारण करनेके लिए समर्थ नहीं रहा ।।१८८।। मैंने दुर्गम समुद्र के बीच में रहनेवाले हजारों बड़े-बड़े विद्याधर युद्ध में जीते हैं पर इस समय यह क्या हो रहा है ? ॥१८९॥ जिसका लोकपालरूपी परिकर समस्त संसारमें प्रसिद्ध था ऐसे राजा इन्द्रको भी मैंने पहले बन्दीगृह में डाल रखा था तथा अनेक युद्धोंमें जिसने राजाओंके समूहको पराजित किया था ऐसा मैं इस समय मोहके द्वारा भस्मीभूत हो रहा हूँ ॥१९०-१९१।। गौतम कहते हैं कि हे राजन् ! यह तथा अन्य वस्तुओंका चिन्तवन करता हुआ रावण कामरूपी आचार्यके वशीभूत हो रहा था सो यह रहने दो अब दूसरी बात सुनो ॥१९२॥ अथानन्तर आकुलतासे भरा तथा बड़ी-बड़ी मन्त्रणा करने में निपुण विभीषण मन्त्रियोंके साथ बैठकर इस प्रकार निरूपण करनेके लिए तत्पर हुआ ॥१९३।। यथार्थमें समस्त शास्त्रोंके ज्ञान १. माकृष्णाधर-म.। २. केशाद्वर्तयति म.। ३. कदम्बकम् म.। ४. महामन्त्रिविशारदः ख.। २-३४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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