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________________ विषयानुक्रमणिका अपने आपको प्रकट किया । रामके पास सब लोग पहुँचे। राजा पृथिवीधर रानी इन्द्राणीके साथ सज-धजकर उनके पास गये। आमोद-प्रमोदसे लक्ष्मणका वनमालाके साथ विवाह हुआ। १४७-१५४ सैंतीसवाँ पर राजा पृथिवीधर के सभामण्डपमें राम सुखासीन हैं उसी समय राजा अतिवीर्यका दूत एक पत्र राजा पृथिवीधरको देता है। उसमें लिखा था कि मैं अयोध्याके राजा भरतके प्रति अभियान कर रहा हूँ अतः सहायताके लिए सदल बल शोघ्र पधारो । रामके पूछने पर दूतने भरतके प्रति होनेवाले अभियानका कारण भी बताया। रामका संकेत पाकर राजा पृथिवीधरने दूतको आश्वासन देकर विदा किया। तदनन्तर परस्परके विचार-विमर्श के बाद, राम लक्ष्मणसीता ओर पृथिवीधरके पुत्रोंके साथ अतिवीर्यको राजधानीकी ओर चले। वहाँ पहुँचकर उन्होंने बड़ी गम्भीरताके साथ कर्तव्य मार्गका निर्णय कर, राम-लक्ष्मण सीताको आर्यिकाअोंके पास छोड़ नर्तकियोंके वेषमें अतिवीर्यके दरबारमें गये। वहाँ उन्होंने अपने अनुपम संगीतों और कलापूर्ण नृत्योंसे उसे मन्त्र-मुग्धकी तरह वशीभूत कर लिया । रङ्ग जमा हुआ देख नर्तकीने डाँट दिखाते हुए कहा कि तू भरतके प्रति जो अभियान कर रहा है यह तेरी मृत्युका कारण है अतः यदि जीवित रहना चाहता है तो भरतको प्रणाम कर । इस प्रकार अपनी तर्जना और भरतकी प्रशंसा सुन ऋद्ध हो अतिवीर्यने नर्तकियोंको मारने के लिए जो तलवार ऊपर उठाई थी लक्ष्मणने उसे लपक कर छीन लिया और उससे ही सब राजाओंको भयभीत कर अतिवीर्य को जीवित पकड़ लिया। नर्तकियोंकी यह विचित्र शक्ति देख श्रागत राजामहाराजा पलायमान हो गये। राम-लक्ष्मणने बन्धनबद्ध अतिवीर्यको ले जाकर सीता के सामने रख दिया। उसकी दुःखपूर्ण अवस्था देख सीता दयासे द्रवीभूत हो गई । फलस्वरूप उसने उसे छड़वा दिया। अतिवीर्यने सब मान छोड़ कर जिनदीक्षा धारण कर ली। राम-लक्ष्मण रात्रिमेघकी तरह अव्यक्त रूपसे भरतकी रक्षा कर आगे बढ़ गये । १५५-१६६ अड़तीसवाँ पर्व रामने अतिवीर्यके पुत्र विजयरथका राज्याभिषेक किया। अतिवीर्य के मुनि होनेका समाचार सुन भरत उनके दर्शन करने के लिए गया । दर्शन कर क्षमा माँगी, मुनिराजकी स्तुति की। भरतको नर्तकियोंका पता नहीं था अतः वह श्राश्चर्यसागर में निमग्न था। वनमालाको आश्वासन दे राम-लक्ष्मण आगे बढ़े। क्षेमाञ्जलिपुर नगरके बाहर सब ठहरे । भोजनोपरान्त लक्ष्मण, रामकी आज्ञासे नगर में प्रविष्ट हुए और वहाँ के राजा शत्रुदमनकी शक्तिको झेल कर उसकी पुत्री जिनपद्माको अपने पर आसक्त किया । जिनपद्माका पिता राजा शत्रुदमन सेना के साथ राम और सीताके पास गया । राम सेनाको आती देख पहले तो आश्चर्य में पड़े परन्तु बाद में यथार्थ बातका पता चलने पर निश्चिन्त हुए। लक्ष्मणका जिनपनाके साथ विवाह हुआ। १६७-१७७ उनतालीसवाँ पर्व राम-लक्ष्मण तथा सीताका वंशस्थद्युति नगर में जाना, भागते नगरवासियोंके द्वारा पर्वतसे पाते हुए भयङ्कर शब्दकी सूचना तथा रामके द्वारा उसका अनुसरण । देशभूषण तथा कुलभूषण नामक मुनियों के दर्शन करके उनका अग्निप्रभ देवके द्वारा किये हुए उपसर्गको दूर करना । तथा मुनियों को केवलज्ञान उत्पन्न होना । मुनियों द्वारा पद्मिनीनगरीके राजा विजयपर्वत तथा रानी धारिणीके दूत अमृतस्वरके पुत्र उदित तथा मुदितकी कथाका भवान्तर सहित वर्णन, भवान्तर सहित देश भूषण तथा कुलभूषण मुनियोंका वर्णन । १७८-१६४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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