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________________ बारहवें श्रुताङ्ग दृष्टिवादका परिचय ५५ आगे यह प्रश्न उठाया गया है कि जब दश और चौदह पूर्वियोंको अलग अलग नमस्कार किया तब बीचके ग्यारहपूर्वी, बारहपूर्वी और तेरहपूर्वियों को भी क्यों नहीं पृथक् नमस्कार किया । इसका उत्तर दिया गया है कि उनको नमस्कार तो चौदहपूर्वियों के नमस्कारमें आ ही जाता है, पर जैसा जिनवचनप्रत्यय विद्यानुवाद की समाप्ति के समय देखा जाता है वैसा ही चौदहपूर्वोकी समाप्तिपर पाया जाता है । जब चौदहपूर्वोको समाप्त करके रात्रिमें श्रुत- केवली कायोत्सर्ग से विराजमान रहते हैं तब प्रभात समय भवनवासी, बाणव्यंतर, ज्योतिषी, और कल्पवासी देव आकर उनकी शेखसूर्य के साथ महापूजा करते हैं । इसप्रकार यद्यपि जिनवचनत्वकी अपेक्षासे सभी पूर्व समान हैं, तथापि विद्यानुप्रवाद और लोकबिन्दुसारका महत्त्व विशेष है, क्योंकि यहीं देवोंद्वारा पूजा प्राप्त होती है । दोनों अवस्थाओं में विशेषता केवल इतनी है कि चतुर्दशपूर्वधारी फिर मिथ्यात्व में नहीं जा सकता और उस भवमें असंयमको भी प्राप्त नहीं होता । इससे जाना जाता है कि श्रुतपाठियों की विधा एक प्रकारसे दशम पूर्वपर ही समाप्त हो जाती थी, वहीं वह देवपूजाको भी प्राप्त कर लेता था और यदि लोभमें आकर पथभ्रष्ट न हुआ तो 'जिन' संज्ञाका भी अधिकारी रहता था । इससे दिगम्बर सम्प्रदाय में दृष्टिवादके प्रथमानुयोग नामक विभागको पूर्वगत से पहले रखने की सार्थकता भी सिद्ध हो जाती है । यदि पूर्वगतके I पश्चात् प्रथमानुयोग रहा तो उसका तात्पर्य यह होगा कि दशपूर्वियोंको उसका ज्ञान ही नहीं हो पायगा । अतएव इस दशपूर्वीकी मान्यता के अनुसार प्रथमानुयोगको पूर्वोसे पहले रखना बहुत सार्थक है । आगेके शेष पूर्व और चूलिकाएं लौकिक और चमत्कारिक विद्याओंसे ही संबंध रखती हैं, वे आत्मशुद्धि बढ़ाने में उतनी कार्यकारी नहीं हैं, जितनी उसकी दृढ़ताकी परीक्षा कराने हैं । भिन्न और अभिन्न दशपूर्वीकी मान्यताका निर्देश नंदीसूत्र में भी है, यथा इच्छेनं दुवालसंगं गणिपिडगं चोदसपुव्विस्ल सम्मसुअं अभिण्णदसपुव्विस्स सम्मसुअं, तेण परं भिण्णेसु भयणा से तं सम्मसु ' (सू. ४१ ) टीकाकारने भिन्न और अभिन्न दशपूर्वीका स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है इत्येतद् द्वादशांग गणिपिटकं यश्चतुर्दश पूर्वी तस्य सकलमपि सामायिकादि बिन्दुसार पर्यवसानं नियमात् सम्यक् श्रुतं । ततो अधोमुखपरिहान्या नियमतः सर्वं सम्यक् श्रुतं तावद् वक्तव्यं यावदभिन्नदशपूर्विणः - सम्पूर्णदश पूर्वधरस्य । सम्पूर्णदश पूर्वधरत्वादिकं हि नियमतः सम्यग्दृष्टेरेव, न मिथ्यादृष्टेः, तथा स्वाभाव्यात् । तथाहि यथा अभव्यो ग्रंथिदेशमुपागतोऽपि तथा स्वभावत्त्वात् न ग्रंथिभेदमाधातुमलम्, एवं मिथ्यादृष्टिरपि भुतमवगाहमानः प्रकर्षतोऽपि तावदवगाहते यावत्किश्चन्न्यूनानि दशपूर्वाणि भवन्ति, परिपूर्णानि तु तानि नावगाढुं शक्नोति तथा स्वभावत्वादिति । ' इत्यादि C 6 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001396
Book TitleShatkhandagama Pustak 02
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
AuthorHiralal Jain, Fulchandra Jain Shastri, Devkinandan, A N Upadhye
PublisherJain Sahityoddharak Fund Karyalay Amravati
Publication Year1940
Total Pages568
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size12 MB
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