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________________ चतुर्थः सर्गः चतुःषष्टिर्महादिक्षु षष्टिरेव विदिक्षु च । आरस्यापि शतं मिश्रं चतुर्विंशतिसंमतम् ॥१२९॥ षष्टिरेव महादिक्ष षट्पञ्चाशद्विदिक्ष च । तारस्यापि च तन्मिश्रं षोडशाग्रं शतं मतम् ॥१३॥ षट्पञ्चाशन्महादिक्षु द्वापञ्चाशद्विदिक्षु च । मारस्यापि च तन्मिनं मतमष्टोत्तरं शतम् ॥१३१॥ बापञ्चाशन्महादिक्षु चत्वारिंशत् सहाष्टमिः । वर्चस्कस्य विदिक्षु स्यात्तन्मिभं शतमेव तु ॥१३२॥ चत्वारिंशत् सहाष्टाभिर्महादिक्ष विदिक्ष तु । तमकस्य चतुर्मिश्च युतं वा नवतिर्द्वयम् ॥१३३॥ चत्वारिंशचतुर्भिश्च महादिक्षु विदिक्षु तु । चत्वारिंशत् खडस्येयमशीतिश्चतुरुत्तरा ॥३३॥ : चत्वारिंशन्महादिक्ष षट्त्रिंशच्च विदिक्षु च । युता खडखडस्येव षट्सप्ततिरुदाहृता ।।१३।। इन्द्रकैः सह सप्त स्युः शतान्येतानि सप्त च । श्रेणीबद्धानि सर्वाणि नरकाण्यत्र संमवात् ॥ १३६॥ लक्षा नवसहस्राणि नवतिर्नवमिः सह । नवतिश्च त्रिभिर्युक्ता द्विशती च प्रकीर्णकाः ॥१३॥ षटत्रिंशच महादिक्ष द्वात्रिंशत्तु विदिक्ष तत् । तमःश्रुतेयं मिश्रमष्टाषष्टिरुदाहृता ॥१३॥ द्वात्रिंशश्च महादिक्ष, 'भ्रमस्याष्टौ च विंशतिः । विदिक्ष मिश्रितं तच्च षष्टिरिष्टा मनीषिभिः ॥१३९।। भष्टाविंशतिरुद्दिष्टा महादिक्षु विदिक्ष तु । श्रेषस्य चतुरूना स्यावापञ्चाशद्वयं युता ।।१४०॥ चतुर्विशतिरन्ध्रस्य महादिक्ष विदिक्षु तु । विंशतिमिश्रियं तस्य चत्वारिंशञ्चतुर्युता ॥१४॥ विंशतिस्तु महादिक्षु विदिक्ष्वपि च षोडश । तमिस्रस्य विमिश्रं तत् षट् त्रिंशन्नरकाणि तु ॥१४२॥ - चौथी पृथिवीके पहले प्रस्तार सम्बन्धी आर नामक इन्द्रककी चारों दिशाओंमें चौंसठ, विदिशाओंमें साठ और दोनोंके मिलाकर एक सौ चौबीस श्रेद्धिबद्ध विल हैं ॥१२९।। दूसरे प्रस्तारके तार नामक इन्द्रककी चारों दिशाओंमें साठ, विदिशाओंमें छप्पन और दोनोंके मिलाकर एक सौ सोलह श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१३०॥ तीसरे प्रस्तारके मार नामक इन्द्रककी चारों महादिशाओंमें छप्पन, विदिशाओंमें बावन और दोनोंके मिलाकर एक सौ आठ श्रेणिबद्ध विमान हैं ॥१३१॥ चौथे प्रस्तारके वर्चस्क नामक इन्द्रककी चारों महादिशाओंमें बावन, विदिशाओंमें अड़तालीस और दोनोंके मिलाकर एक सौ श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१३२॥ पांचवें प्रस्तारके तमक नामक इन्द्रकको चारों महादिशाओंमें अड़तालीस, विदिशाओंमें चवालीस और दोनोंके मिलाकर बानबे श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१३३॥ छठवें प्रस्तारके खड नामक इन्द्रकको चारों दिशाओंमें चवालीस, विदिशाओंमें चालीस और दोनोंके मिलाकर चौरासी श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१३४॥ और सातवें प्रस्तारके खड-खड नामक इन्द्रककी चारों महादिशाओंमें चालीस. विदिशाओंमें छत्ती दोनोंके मिलाकर छिहत्तर श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१३५॥ इस प्रकार चौथी भूमिमें सात इन्द्रक विलोंकी संख्या मिलाकर सब इन्द्रक और श्रेणिबद्ध विलोंकी संख्या सात सौ सात है ॥१३६॥ इनके सिवाय नौ लाख निन्यानबे हजार दो सौ तिरान प्रकोणक विल हैं तथा सब मिलाकर दश लाख विल हैं ॥१३७॥ पांचवीं पृथिवी सम्बन्धी प्रथम प्रस्तारके तम नामक इन्द्रकको चारों महादिशाओंमें छत्तीस, विदिशाओंमें बत्तीस और दोनोंके मिलाकर अड़सठ श्रेणिबद्ध विल हैं ।।१३८॥ दूसरे प्रस्तारमें भ्रम नामक इन्द्रककी चारों महादिशाओंमें बत्तीस, विदिशाओंमें अट्ठाईस और दोनोंके मिलाकर साठ श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१३९॥ तीसरे प्रस्तारके ऋषभ नामक इन्द्रकी चारों महादिशाओंमें अटाईस. में अट्ठाईस, विदिशाओंमें चौबीस और दोनोंमें मिलाकर बावन श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१४०॥ चौथे प्रस्तारके अन्ध्र नामक इन्द्रकको चारों दिशाओंमें चौबीस, विदिशाओंमें बोस और दोनोंके मिलाकर चवालीस श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१४१॥ और पांचवें प्रस्तारके तमिस्र नामक इन्द्रककी चारों दिशाओंमें बीस, विदिशाओंमें सोलह और दोनोंके मिलाकर छत्तीस श्रेणिबद्ध विल हैं ॥१४२॥ इस १. तमस्याष्टो म. । २. ऋषभस्य म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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