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________________ ३४ हरिवंशपुराणे सदृष्टिज्ञानचारित्रप्रतिपत्तिपुरःसराः । मोक्षप्रातिक्षमा भव्या अमव्यास्तद्विलक्षणाः ॥१०१॥ आसन्न भव्यता हेतोरर्वाग्दर्शिभिरुह्यते । विशुद्धदर्शनज्ञानचास्त्रित्रयलक्षणात् ॥१०२॥ सदाप्तवचनादेव बोद्धव्या दूरमव्यता । अमव्यता च भूतानामहेतुविषया ततः ॥ १०३ ॥ जीवस्वमावभावोऽयं भव्या भव्यत्वलक्षणः । एकाधारचुटन्माषककटूकात्ममाषवत् ॥ १०४॥ अनादिरन्तवान् भव्य व्यक्तीनां भवसागरः । मव्यसंतान सामान्यचिन्तनादन्तवर्जितः ॥ १०५ ॥ अनादिरपि चानन्तः संतानाद् व्यक्तितोऽपि च । अभव्यजीवराशीनां भवव्यसनसागरः ॥ १०६॥ भव्याभव्या भवेऽनन्ता जीवराशिद्वये स्थिताः । मिथ्यात्वाद् भुञ्जते दुःखं कालद्रव्यवदक्षयाः ॥ १०७॥ द्रव्यपर्यायरूपत्वान्नित्यानित्योभयात्मकाः । मिथ्यात्वा संयमैर्योगेः कषायैः कलुषीकृताः ॥ १०८ ॥ बध्नानाः सततं पाप कर्म दुर्मोचबन्धनम् । जन्तवः परिवर्तन्ते चतुर्गतिषु दुःखिनः ॥ १०९ ॥ रौद्रध्यानाविलास्मानो बह्वारम्भपरिग्रहाः । मिथ्यात्वाष्टमदक्लिष्टा विशिष्टानिष्टदृष्टयः ॥ ११० ॥ स्वप्रशंसापरा निन्द्याः परनिन्दाभिनन्दिनः । परस्वहरणे लुब्धा भोगतृष्णातिरेकिणः ॥१११॥ भव्यपना तथा अभव्यपना दोनों ही सम्भव हैं || १०० || सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रको प्राप्तिपूर्वक जो जीव मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ हैं वे भव्य कहलाते हैं और जो इनसे विपरीत हैं वे अभव्य कहे जाते हैं ॥१०१॥ जो विशुद्ध सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्कुचारित्ररूपी लक्षण से युक्त हैं वे आसन्नभव्य हैं और उनकी आसन्नभव्यता आधुनिक पुरुषोंके द्वारा भी जानी जा सकती है । परन्तु दूर भव्यता और अभव्यता सदा आप्त भगवान् के वचनोंसे ही जानी जा सकती है क्योंकि वह साधारण प्राणियों के हेतुका विषय नहीं है अर्थात् साधारण व्यक्ति उसे हेतु द्वारा जान नहीं सकते ।। १०२ - १०३ ।। यह भव्यत्व और अभव्यत्व भाव जीवका स्वाभाविकपारिणामिक भाव है तथा एक बरतनमें भरकर सीजनेके लिए अग्निपर रखे हुए सीजनेवाले और न सीजनेवाले उड़द के समान हैं । भावार्थ - भव्यजीव निमित्त मिलनेपर सिद्ध पर्यायको प्राप्त हो जाते हैं और अभव्य जीव बाह्य निमित्त मिलनेपर भी निजकी योग्यता न होनेसे सिद्ध पर्याय नहीं प्राप्त कर पाते || १०४ || भव्य जीवोंका संसार-सागर अनादि और सान्त है तथा सामान्य भव्यजीवोंकी अपेक्षा अनादि अनन्त है || १०५ || अभव्यजीव राशिका संसारसागर व्यक्ति तथा समूह दोनोंकी अपेक्षा अनादि अनन्त है || १०६ || संसारमें जीवोंकी दो राशियाँ हैं - एक भव्य और दूसरी अभव्य । ये दोनों ही प्रकारकी राशियाँ अनन्त हैं, मिथ्यात्व कर्मके उदयसे दुःख भोगती रहती हैं और कालद्रव्यके समान अक्षय - अविनाशी हैं अर्थात् जिस प्रकार कालद्रव्यका कभी अन्त नहीं होता उसी प्रकार उन दोनों राशियों का भी कभी अन्त नहीं होता || १०७॥ ये जीव द्रव्यकी अपेक्षा नित्य हैं पर्यायको अपेक्षा अनित्य हैं, तथा एक साथ दोनोंकी अपेक्षा उभयात्मक - नित्यानित्यात्मक हैं, मिथ्यात्व, अविरति, योग और कषायके द्वारा कलुषित हो रहे हैं तथा जिसका छूटना कठिन है ऐसे पापकर्मका निरन्तर बन्ध करते हुए दुःखो हो चारों गतियोंमें घूमते रहते हैं ॥१-०८-१०९ ॥ जिनकी आत्मा निरन्तर रोद्रध्यानसे मलिन है, जो बहुत आरम्भ और परिग्रहसे सहित हैं, मिथ्यादर्शन तथा ज्ञानमद, पूजामद आदि आठ मदोंसे क्लेश उठाते हैं, जिनकी दृष्टि अत्यन्त अनिष्टरूप है, जो आत्मप्रशंसा में तत्पर हैं, निन्दनीय हैं, दूसरेकी निन्दासे आनन्द मानते हैं, १. चुटन्माषाश्च कङ्कटूकात्ममाषाश्चेति चुटन्माषकङ्कटूकात्ममाषाः, एकाधाराश्च ते चुटन्माषकङ्कटुकात्ममाषाश्च, ते तथोक्ताः तेषामिव तद्वत् । एकाधारे एकस्मिन् भाजने एके चुटन्माषाः निष्पन्नाः अन्ये कङ्कटूकात्ममाषाः अनिष्पन्नाः तेषामिव । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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