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________________ द्वितीयः सर्गः गण्डस्थलमदामोदभ्रमभ्रमरमण्डलम् । तमिवाधित्यकावस्थतमालवनमण्डितम् ॥३३॥ कर्णान्तरततासक्तरक्त चामरसंहतिम् । तं यथाधित्यकाधीनरकाशोकमहावनम् ॥३४॥ 'सुवर्णारिक्षया चाा परिवेष्टितविग्रहम् । तमेव च यथोपात्तकनस्कनकमेखलम् ॥३५॥ 'अनेकरदसंवृत्तनृत्यसंगीतयोषितम् । तमिवोत्तङ्गशृङ्गाग्रनृत्यद्गायरसुराजनम् ॥३६॥ सुवृत्तदीर्घसंचारिकररुद्ध दिगन्तरम् । तमिवात्यायतस्थूलस्फुरद्भोगभुजङ्गमम् ॥३७॥ ऐशानधारितस्फीतधवलातपवारणम् । तमिवोर्ध्वस्थिताभ्यर्णसंपूर्णशशिमण्डलम् ॥३८॥ चामरेन्द्र भुजोक्षिप्तचलच्चामरहारिणम् । तं यथा चमरीक्षिप्तबालव्यजनवी जितम् ॥३९॥ ऐरावतं समारोप्य जिनेन्द्रं तस्य मण्डनम् । देवैः सह गतः प्राप मन्दरं स पुरन्दरः॥४०॥ (नवभिः कुलकम्) तं पाण्डुकवने रम्ये मन्दरस्य जिनं हरिः । पाण्डुकायां प्रसिद्धायां शिलायां सिंहविष्टरे ॥४१॥ संस्थाप्य विबुधानीतक्षीरसागरवारिभिः । शातकुम्भमयैः कुम्भैरभिषिच्य समं सुरैः ॥४२॥ वस्त्रालंकारमालाधरलंकृत्य कृतस्तुतिः । आनीय मातुरुत्संगे जिनं कृत्वा कृतोचितः ॥४३॥ सिद्धार्थप्रियकारिण्योः सममानन्ददायकम् । वर्धमानाख्यया स्तुत्वा सदेवो वासवोऽगमत् ॥४४॥ मासान् पञ्चदशाऽऽजन्म गुम्नधारा दिने दिने । याः पूर्वमापतंस्ताभिस्तर्पितोऽर्थी जनोऽखिलः॥४५|| पड़ता था जो कि ऊपरी भागपर स्थित तमाल वनसे मण्डित था ||३३|| जिसके कानोंके समीप लाल-लाल चमरोके समूह लटक रहे थे और उनसे जो सुमेरुके उस शिखर-समूहके समान जान पड़ता था जिसके कि ऊपरी भागपर लाल-लाल अशोकोंका महावन फूल रहा था ॥३४।। जिसका शरीर सुर्वणकी सुन्दर सांकलसे वेष्टित था और उससे जो सुमेरुके उस शिखर-समूहके समान जान पड़ता था जिसके कि समीप स्वर्ण की मेखला देदीप्यमान हो रही थी ॥३५।। जो अनेक दांतोंपर होनेवाले नृत्य और संगीतसे परिपुष्ट था और उससे जो उस सुमेरुके समान जान पड़ता था जिसकी कि अत्यन्त ऊंचे शिखरोंके अग्र भागपर देवांगनाएं नृत्य-गायन कर रही थीं ॥३६।। जिसने अपनी गोल लम्बो तथा चारों ओर घूमनेवाली सूंड़ोंसे दिशाओंके अन्तरालको व्याप्त कर रखा था और उनसे जो उस सुमेरुके समान जान पड़ता था जिसके कि समीप अत्यन्त लम्बे-मोटे और फणाओंसे युक्त सांप घूम रहे थे ।।३७॥ जिसके ऊपर ऐशानेन्द्रने बड़ा भारी सफेद छत्र धारण कर रखा था और उससे जो उस सुमेरुके समान जान पड़ता था जिसके कि ऊपर समीप ही पूर्ण चन्द्रमाका मण्डल विद्यमान था ॥३८॥ और जो चमरेन्द्रकी भुजाओंके द्वारा ढोरे हए चंचल चमरों से सुन्दर था तथा उनसे उस सुमेरुके समूहके समान जान पड़ता था जो कि चमरो मृगोंके द्वारा उत्क्षिप्त पूछोंसे सुशोभित था ॥३९॥ इस प्रकार वह इन्द्र आभरणस्वरूप श्रो जिनेन्द्र देवको उस ऐरावत हाथीपर विराजमान कर देवोंके साथ सुमेरु पर्वतपर गया ।।४०॥ वहां जाकर इन्द्रने सुमेरु पर्वतके अत्यन्त रमणीय पाण्डुकवनमें पाण्डुक नामको प्रसिद्ध शिलापर जो सिंहासन था उसपर श्री जिन बालकको विराजमान किया, स्वर्णमय कुम्भोंमें भरकर देवों द्वारा लाये हए क्षीरसागरके जलसे देवोंके साथ उनका अभिषेक किया. वस्त्र. अलंकार तथा माला आदिसे उन्हें अलंकृत कर उनकी स्तुति को, तदनन्तर वापस लाकर माताकी गोदमें विराजमान किया, अन्य यथोचित कार्य किये और उनके माता-पिता राजा सिद्धार्थ तथा रानी प्रियकारिणी को समान आनन्द देनेवाले उन जिन बालककी वर्धमान इस नामसे स्तुति की तदनन्तर वह देवोंके साथ यथास्थान चला गया ।।४१-४४|| भगवानके जन्मसे पन्द्रह मास पूर्व प्रतिदिन जो रत्नोंकी धाराएं बरसी थीं उनसे समस्त याचक सन्तुष्ट हो १. सुवर्णक्षुद्रघण्टामालया । २. त्यायति म. । ३. अनेकरक्षसंछन्न ख. । ४. पोषितं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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