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________________ विषय सूची विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ प्रथम सर्ग रचना की। इन्द्रभूति आदि पण्डितोंने उनकी मंगलाचरणके अन्तर्गत अनाद्यनिधन जिन सभामें आकर उनसे दीक्षा धारण की। राजा शासन, तीर्थनायक श्री वर्धमान स्वामी, चेटककी पुत्री चन्दना भी आर्यिका होकर शेष ऋषभादि २३ तीर्थकर अतीत-अनागतके गणिनी हुई है । राजा श्रेणिक चतुरंग सेनाके चौबीस जिनेन्द्र और अहंदादि पंच परमे साथ भगवान्के समवसरणमें पहुंचा। समवष्ठियोंका स्तवन सरणका संक्षिप्त वर्णन १७-१९ समन्तभद्र, सिद्धसेन, देवनन्दी, वज्रसूरि, श्रावण कृष्ण प्रतिपदाके दिन अभिजित् नक्षत्रमहासेन, रविषेण, वरांगचरितके कर्ता जटा में भगवान्की प्रथम देशना हुई । उसमें अंगसिंहनन्दी, शान्तिषेण, विशेषवादी कवि, प्रविष्ट और अंगबाहय श्रुतका वर्णन, गुणकुमारसेन, वीरसेन, जिनसेन आदि पूर्वाचार्यों- स्थान, मार्गणा, जीवसमास तथा जीवादि का स्मरण ३-५ सात तत्त्वोंकी विस्तृत चर्चा हुई १९-२० सज्जन-प्रशंसा, दुर्जन-निन्दा ५-६ गौतम गणधर द्वारा द्वादशांगकी रचना, ग्रन्थकत प्रतिज्ञा, ग्रन्थके मूलोत्तर ग्रन्थकर्ता ६-७ भगवान की दिव्यध्वनि श्रवण कर राजा स्वाध्यायको उपयोगिता, ग्रन्थके वर्णनीय श्रेणिकने सम्यग्दर्शन धारण किया। 'अहिंसा अधिकारोंका संग्रह ७-११ महाव्रत आदि श्रमणधर्म-मुनिधर्मका वर्णन ग्रन्थकी महत्ता और उसके अध्ययनकी प्रेरणा ११ सुनकर कितने ही जीवोंने महाव्रत और द्वितीय सर्ग कितने ही मनुष्य तथा तियंचोंने देशव्रत धारण किया। क्षायिक सम्यग्दर्शनकी महिमा और जम्बूद्वीप सम्बन्धी विदेह देशके कुण्डपुर ग्राममें राजा सर्वार्थ और रानी श्रीमतीके राजा समवसरणके प्रभावका निरूपण २१-२३ सिद्धार्थ पुत्र थे। इनकी प्रियकारिणी स्त्रीके तृतीय सर्ग गर्भ में अच्युत स्वर्गके पुष्पोत्तर विमानसे च्युत भगवान महावीरका भरतक्षेत्रके आर्यखण्ड होकर भगवान् महावीरका जीव आया १२-१३।। सम्बन्धी अनेक देशों में विहार, चौंतीस अतिभगवान महावीर स्वामीके गर्भ और जन्म शय, अष्ट प्रातिहार्य, गणधर तथा अन्य कल्याणकका वर्णन १४-१५ शिष्य समूहका निरूपण २४-२७ उनका वर्धमान नाम था, तीस वर्षको अव भगवानका पंचशैल-राजगृहपर पहुँचना, स्थामें जिनदीक्षा लेकर उन्होंने १२ वर्ष तक उसकी प्राकृतिक सुषमाका वर्णन, और विपुलाघनघोर तपस्या की । तदनन्तर ऋजु चलपर भगवान्का समवसरण रचा जाना । कुला नदी के तटपर केवलज्ञान प्राप्त कर ६६ चतुर्विध संघके समक्ष दिव्यध्वनि द्वारा जीवादिन तक मौन विहार किया १६-१७ जीवादि तत्त्व, चौदह गुणस्थान, चतुर्गतिके पश्चात् राजगृहीके विपुलाचलपर आये। दुःख, और उनमें उत्पन्न होनेके कारण वहाँ देवोंने एक योजन विस्तृत समवसरणकी आदिका वर्णन तथा भगवान की देशना सुनकर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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