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________________ प्रस्तावना १९ किया है। नारदमुक्ति तथा सम्यग्दृष्टि कृष्णके द्वारा मिथ्यामार्ग चलानेकी बातपर भी आपने मेरा ध्यान आकृष्ट किया था। इस तरह इन विद्वानोंका मैं आभार मानता हूँ। पं. दरबारीलालजी सत्यभक्त-द्वारा सम्पादित और माणिकचन्द्र ग्रन्थमाला बम्बईसे प्रकाशित मूल हरिवंशपुराण तथा पं. दौलतरामजी और पं. गजाधरलालजी कृत हिन्दी टीकाएँ भी हमारे कार्य में पर्याप्त सहायक सिद्ध हुई हैं इसलिए इनके प्रति मैं समादर प्रकट करता हूँ। प्रस्तावना लेखमें श्रीमान् स्वर्गीय नाथुरामजी प्रेमीके 'जैन-साहित्यका इतिहास' से यथेच्छ सहायता ली गयी है अतः उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करता हूँ। महापुराणकी प्रस्तावना प्रेमीजीने रुग्ण रहते हुए भी स्वयं देखी थी। पद्मपुराणकी प्रस्तावनामें काफी विचार पत्रों द्वारा दिये थे पर हरिवंशपुराण की प्रस्तावनाके समय हमें उनका प्रत्यक्ष सहयोग न मिलकर मात्र उनके लेखका परोक्ष सहयोग मिल रहा है इसका हृदयमें दुःख है। किसी भी व्यक्तिको परखने और उसे ऊँचा उठानेकी उनकी उदात्त भावना सम्पर्कमें आनेवाले प्रत्येक व्यक्तिको अपनी ओर आकृष्ट कर लेती थी। हरिवंशके इस संस्करणको पद्यानुक्रमणिका, शब्दकोष तथा सूक्तिरत्नाकर आदि स्तम्भोंसे अत्यन्त उपयोगी बनानेका प्रयत्न किया गया है। तत्तत्प्रकरणोंमें तुलनात्मक टिप्पणोंसे भी इसे उपयोगी बनाया गया है । इस कार्यके लिए श्री डॉ. हीरालालजी, डॉ. ए. एन. उपाध्ये तथा बाबू लक्ष्मीचन्द्रजीने सुझाव और सत्प्रेरणा दी है जिसके लिए मैं उनका कृतज्ञ हूँ। इतना सुन्दर और सुव्यवस्थित प्रकाशन करने के लिए भारतीय ज्ञानपीठके संस्थापक साहू शान्तिप्रसादजी तथा उसकी अध्यक्षा रमारानीजी धन्यवादके पात्र हैं । महापुराण, पद्मपुराण और हरिवंशपुराणको सुसम्पादित करनेकी मेरी चिर-साधना साहूजीकी उदारतासे हो पूर्ण हो सकी है। इसलिए उनके प्रति अपनी श्रद्धा किन शब्दों में प्रकट करूं? यहाँ यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि आजका वातावरण आहत दर्शनके प्रचारके लिए अत्यन्त उपयुक्त है । शंकराचार्यके समयसे लेकर अभी पिछले पचीस-पचास वर्ष पूर्व तकका समय इतना संघर्षपूर्ण समय था कि लोग एक-दूसरेके दर्शन या धर्मकी बातको सूनना ही पाप समझते थे पर सौभाग्यसे अब वह संघर्षमय वातावरण समाप्तप्राय है और धीरे-धीरे बिलकुल ही समाप्त होने के सम्मुख है। आजका मानव एक-दूसरे दर्शन या धर्मकी बातको सूनने और समझनेके लिए तैयार है । आज आर्हत दर्शनके हीरे-जवाहरात कुन्दकुन्द और समन्तभद्रके अनूठे-अनूठे ग्रन्थ विश्वके सामने रखे जावें तो विश्वके प्रत्येक मानवका अन्तरात्मा उनके अलौकिक प्रकाशसे जगमगा उठे । आवश्यकता है कि कुन्दकुन्द स्वामीकी अध्यात्मधारा विश्वके रंगमंचपर प्रवाहित की जाये जिससे आजका संताप-सन्त्रस्त मानव उसमें अवगाहन कर सच्ची शान्तिका अनुभव कर सके। आजकी सरकार जिन पंचशीलोंकी स्थापना कर विश्व शान्ति स्थापित करना चाहती है, उन पंचशीलोंके सिद्धान्त तथा समाजवाद और निरतिवादके सिद्धान्त आर्हत दर्शनोंमें उनके पुराण, काव्य और कथा-ग्रन्थोंमें कूट-कूट कर भरे हुए हैं। यदि आहत दर्शनका अनुयायी समाज अपने दर्शनके प्रकाशनार्थ पंचवर्षीय योजना बना ले और पूरी शक्तिके साथ जट पडे तो उसके इतिहासमें एक गणनीय काय जावेगा । जैनमन्दिरों के अन्दर लाखों-करोड़ोंको सम्पत्ति अनावश्यक पड़ी हई है। यदि जिनेन्द्र देवकी वाणीके प्रचारमें उसीका उपयोग कर लिया जाये तो यह महान पुण्यका कार्य होगा। मन्दिरोंमें चाँदी-सोनेके बर्तनोंके संग्रह तथा संगमर्मर आदि लगवानेकी अपेक्षा जिनवाणीके प्रचारमें जो द्रव्य खर्च होता है वह लाखगुना अच्छा है-अर्हत धर्मकी सच्ची प्रभावना करनेवाला है। __ अन्त में ग्रन्थकी अगाधता और अपनी अल्पज्ञता तथा व्यस्तताके कारण हुई त्रुटियोंके लिए क्षमायाचना करता हुआ प्रस्तावना लेख समाप्त करता हूँ। सागर २३।८।६२ विनम्र पन्नालाल जैन Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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