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________________ हरिवंशपुराणे ४. वीर जयवराह यह पश्चिममें सौरोंके अधिमण्डलका राजा था। सौरोंके अधिमण्डलका अर्थ हम सौराष्ट्र ही समझते हैं जो काठियावाड़के दक्षिणमें है। सौर लोगोंका राष्ट्र सौर-राष्ट्र या सौराष्ट्रसे बढ़वाण और उसके पश्चिमकी ओरका प्रदेश ही ग्रन्थकर्ताको अभीष्ट है। यह राजा किस वंशका था इसका ठीक पता नहीं चलता । हमारा अनुमान है कि यह चालुक्य वंशका कोई राजा होगा और उसके नामके साथ 'वरआह' का प्रयोग उस तरह होता होगा जिस तरह कि कीर्तिवर्मा (द्वितीय) के साथ महावराहका। राष्ट्रकूटोंसे पहले चौलुक्य सार्वभौम-राजा थे और काठियावाड़पर भी उनका अधिकार था। उनसे यह सार्वभौमपना श. सं. ६७५ के लगभग राष्ट्रकूटोंने ही छीना था, इसलिए बहुत सम्भव है कि हरिवंशकी रचनाके समय सौराष्ट्रपर चौलुक्य वंशकी हो किसी शाखाका अधिकार हो और उसीको जयवराह लिखा हो । सम्भवतः पूरा नाम जयसिंह हो और वराह विशेषण। प्रतिहार राजा महीपालके समयका एक दानपत्र हड्डाला गाँव ( काठियावाड़) से श. सं. ८३६ का मिला है। उससे मालूम होता है कि उस समय बढ़ वाणमें धरणीवराहका अधिकार था, जो चावड़ा वंशका था और प्रतिहारोंका करद राजा था। इससे एक संभावना यह भी है कि उक्त धरणीवराहका ही कोई ४-६ पीढ़ी पहलेका पूर्वज उक्त जयवराह रहा हो। [७] हरिवंशका रचनाकाल जिनसेनाचार्यने अन्तिम सर्गके ५२वें श्लोकमें हरिवंशका रचनाकाल शक संवत् ७०५ लिखा है जो वि. सं. ८४० होता है। जिनसेनने अपने ग्रन्थको रचनाका समय मात्र शक संवत्में लिखा है जब कि हरिषेणने कथाकोशका रचनाकाल लिखते समय शक संवतके साथ वि. सं. का भी उल्लेख किया है। उत्तरभारत, गजरात और मालवा आदिमें वि. सं. का और दक्षिणमें शक संवतका चलन रहा है। जिनसेनको दक्षिणसे आये हुए एक-दो पीढ़ियाँ ही बीती थीं इसलिए उन्होंने अपने ग्रन्थमें शक संवत्का ही उल्लेख किया है, परन्तु हरिषेणको काठियावाड़में कई पीढ़ियाँ बीत गयी थी इसलिए उन्होंने वहाँकी पद्धतिके अनुसार साथमें वि. सं. का देना भी उचित समझा । [८] जिनसेनके पूर्ववर्ती विद्वान् कृतज्ञताके नाते जिनसेनने अपनेसे पूर्ववर्ती समन्तभद्र, सिद्धसेन, देवनन्दी, वज्रसूरि, महासेन, रविषेण, जटासिंहनन्दो, शान्त ( शान्तिपेण ) विशेपवादी, कुमारसेन गरु, वीरसेनगरु, जिनसेन स्वामी और वर्द्धमान पुराणके कर्ताका नामस्मरण करते हए उनकी प्रशंसा की है। अतः इनके सम्बन्धमें संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार हैसमन्तभद्र समन्तभद्र क्षत्रिय राजपुत्र थे। इनका जन्मनाम शान्तिवर्मा था किन्तु बादमें आप 'समन्तभद्र' इस थतिमधर नामसे लोकमें प्रसिद्ध हए । इनके गुरुका नाम क्या था और इनकी क्या गुरुपरम्परा था यह ज्ञा नहीं हो सका । वादो, वाग्मी और कवि होने के साथ-साथ स्तुतिकार होनेका श्रेय आपको ही प्राप्त है। आप दर्शनशास्त्र के तलद्रष्टा और विलक्षण प्रतिभासम्पन्न थे । एक परिचय पद्यमें तो आपको दैवज्ञ, वैद्य, मान्त्रिक और तान्त्रिक होने के साथ आज्ञासिद्ध सिद्धसारस्वत भी बतलाया है। आपकी सिंहगर्जनासे सभी वादिजन काँपते थे । आपने अनेक देशों में विहार किया और वादियोंको पराजित कर उन्हें सन्मार्गका प्रदर्शन किया । आपको उपलब्ध कृतियाँ बड़ी ही महत्त्वपूर्ण, संक्षिप्त, गूढ़ तथा गम्भीर अर्थकी उद्भाविका हैं। उनके नाम इस प्रकार १. हरिवंशपुराण. सर्ग १. श्लोक २६-४१ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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