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________________ ११२ हरिवंशपुराणे नीलादिस्पृष्टभागस्थे पूर्वोत्तरदिगावृते । सर्वरत्ने सुपर्णेन्द्रो वेणुदारी वसस्यसौ ॥६०८॥ निषधस्पृष्टमागस्थं दक्षिणापरदिग्गतम् । बेलम्बं चातिबेलम्बो वरुणोऽधिवसस्यसौ ॥६०९॥ नीलाद्रिस्पृष्टमागस्थमपरोत्तरदिग्गतम् । प्रभञ्जनं तु तन्नामा वातेन्द्रोऽधिवसत्यसौ ॥६१०॥ इत्यनेकाद्धताकीर्णः सौवर्णो मानुषक्षितेः । प्राकार इव भात्येष मानुषोनरपर्वतः ॥११॥ विद्याधरा न गच्छन्ति नर्षयः प्राप्तलब्धयः । समुद्घातोपपादाभ्यां विनास्मादुत्तरं गिरेः ॥३१२।। जम्बूद्वीपं यथा क्षारः कालोदोऽब्धिः परं यथा । द्वीपं तथैव पर्येति पुष्करोदोऽपि पुष्करम् ॥६१३॥ वारुणीवरनामानं वारुणीवरसागरः । ततः क्षीरवरद्वीपं ख्यातः क्षीरोदसागरः ॥६१४॥ ततो घृतवरद्वीपं षष्ठं धृतवरोदधिः । ततश्चेश्वरद्वीपं पर्येतीक्षरसोदधिः ।।६१५।। नन्दीश्वरवरद्वीपं नन्दीश्वरवरोदधिः । अष्टमं चाष्टमः ख्यातः परिक्षिपति सर्वतः ।।६१६॥ अरुणं नवमं द्वीप सागरोऽरुणसंज्ञकः । अरुणोद्भासनामानमरुणोद्भाससागरः ॥६१७॥ द्वीपं तु कुण्डलवरं स कुण्डलवरोदधिः । ततः शङ्खघरद्वीपं स शङ्खवरसागरः ।।६१८॥ रुचकादिवरद्वीपं रुचकादिवरोदधिः । मजगादिवरद्वीपं भजगादिवरोदधिः ॥६१९॥ द्वीपं कुशवरं नाम्ना ख्यातः कुशवरोदधिः । द्वीपं क्रौञ्चवरं चापि स क्रौञ्चवरसागरः ॥६२०॥ द्विगुणद्विगुणव्यासा यथैते द्वीपसागराः । नामभिः षोडश ख्याताः असंख्येयास्ततः परे ॥६२१॥ आषोडशादीत्यान्यानसंख्यान द्वीपसागरान् । द्वीपो मनःशिलाभिख्यो हरितालस्ततः परः ॥६२२॥ सिन्दूरः श्यामको द्वीपस्तथैवाअनसंज्ञकः । द्वीपो हिङ्गलकाभिख्यस्ततो रूपवरः परः ।।६२३॥ सुवर्णवरनामाऽतो द्वीपो वज्रवरस्ततः । वैडूर्यवरसंज्ञश्च परो नागवरस्तथा ॥६२४॥ द्वीपो भूतवरश्चान्यस्ततो यक्षवरस्ततः । ख्यातो देववरो द्वीपः परश्चेन्दुवरस्ततः ॥६२५॥ गरुडकुमारोंका इन्द्र वेणुदारी रहता है। दक्षिण-पश्चिम कोणमें निषधाचलसे स्पृष्ट भागमें वेलम्ब नामका कूट है उसपर वरुणकुमारोंका अधिपति अतिवेलम्ब देव रहता है। तथा पश्चिमोत्तर दिशामें नीलाचलसे स्पृष्ट भागमें प्रभंजन नामका कूट है और उसके ऊपर वायुकुमारोंका इन्द्र प्रभंजन नामका देव रहता है ।।६०२-६१०।। इस प्रकार अनेक आश्चर्योंसे भरा हुआ यह सुवर्णमय मानुषोत्तर पर्वत मनुष्य क्षेत्रके कोटके समान जान पडता है।३१।। समदघात और उपपादके सिवाय विद्याधर तथा ऋद्धि प्राप्त मुनि भी इस पर्वतके आगे नहीं जा सकते ॥६१२।।। जिस प्रकार जम्बूद्वीपको लवण समुद्र घेरे हुए है उसी प्रकार पुष्करवर द्वीपको पुष्करवर समुद्र घेरे हुए है ॥६१३।। उसके आगे वारुणीवर द्वीपको वारुणीवर सागर, क्षीरवर द्वीपको क्षीरोदसागर, घृतवर द्वीपको घृतवर सागर, इक्षुवर द्वीपको इक्षुवर सागर, आठवें नन्दीश्वर द्वीपको नन्दीश्वरवर सागर, नौवें अरुण द्वीपको अरुणसागर, अरुणोद्भास द्वीपको अरुणोद्भास सागर, कुण्डलवर द्वीपको कुण्डलनर सागर, शंखवर द्वीपको शंखवर सागर, रुचकवर द्वीपको रुचकवर सागर, भुजगवर द्वीपको भुजगवर सागर, कुशवर द्वीपको कुशवर सागर, और क्रौंचवर द्वीपको क्रौंचवर सागर ये सब ओरसे घेरे हुए हैं। जिस प्रकार दूने-दूने विस्तारवाले इन सोलह द्वीपसागरोंका नामोल्लेख पूर्वक वर्णन किया है उसी प्रकार दूने-दूने विस्तारवाले असंख्यात द्वीप-सागर इनके आगे और हैं ॥६१४-६२१॥ सोलहवें द्वीप सागरके आगे असंख्यात द्वीप सागरोंका उल्लंघन कर १ मनःशिल नामका द्वीप है उसके बाद २ हरिताल, ३ सिन्दूर, ४ श्यामक, ५ अंजन, ६ हिंगुलक, ७ रूपवर, ८ सुवर्णवर, ९ वज्रवर, १० वैडूर्यवर, ११ नागवर, १२ भूतवर, १३ यक्षवर, १४ देववर १. वरुणेन्द्रो यसत्यसो म. । २. मतः शिलोऽभिख्यो म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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