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________________ पञ्चमः सर्गः भृङ्गाभृङ्गनिभाप्यन्या कजला कजलप्रभा । पुष्करिण्यश्च वापीनां समास्त्वपरदक्षिणाः ॥३४३॥ श्रीकान्ता प्रथमा वापी श्रीचन्द्रा चापरोत्तरा । तथा श्रीमहितैशानमोग्या श्रीनिलया ततः ॥३४४॥ तथा चोत्तरपूर्वस्यां वापी तु नलिनाभिधा । ततो नलिनगुल्मापि कुमुदा कुमुदप्रभा ॥३४५॥ प्रासादादिकमत्राऽपि पूर्ववत्सर्वमिष्यते । यथैतनन्दने वेद्यं तथा सौमनसे वने ॥३४६॥ दिशि चोत्तरपूर्वस्यां पाण्डके पाण्डुका शिला । पाण्डुकम्बलया सार्द्ध रक्तया रक्तकम्बला ॥३४७॥ विदिक्षु सक्रमा हैमी राजती तापनीयिका । लोहिताक्षमयी चार्द्धचन्द्राकाराश्च ताः शिलाः ॥३४॥ अष्टोच्छ्रयाः शतायामाः पञ्चाशद्विस्तृताश्च ताः । यत्रार्हन्तोऽमिषिच्यन्ते जम्बूद्वीपसमुद्भवाः ॥३४९॥ रक्तापाण्डुकयोध्य दक्षिणोत्तरतः स्थितम् । तत्पूर्वापरतः शेषशिलयोस्तु विशालयोः ॥३५०॥ चापं पञ्चशतोच्छायं मूलव्यासोऽपि यस्य सः । प्रत्येकं तन्महारत्नं तत्र सिंहासनत्रयम् ॥३५१॥ ऐन्द्र दक्षिणमेतेषामैशानं तूत्तरं मतम् । मध्यस्थितं तु जैनेन्दं प्राङ्मुखानि च तान्यपि ॥३५॥ मारतापरवंदेहा ऐरावतविदेहजाः । जिना बाल्ये सुरस्नाप्यास्तासु तेषु यथाक्रमम् ॥३५३॥ बैठता है और आत्मरक्ष उसकी सेवा करते हैं ।।३४२॥ पश्चिम-दक्षिण (नैऋत्य ) दिशामें उक्त वापिकाओंके समान १ भंगा, २ भंगनिभा. ३ कज्जला और ४ कज्जलप्रभा ये चार वापिकाएँ हैं ॥३४३।। पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशामें १ श्रीकान्ता, २ श्रीचन्द्रा ) दिशामें १ श्रीकान्ता, २ श्रीचन्द्रा, ३ श्रीमहिता और ४ श्रोनिलया ये चार वापिकाएं हैं। इनमें ऐशानेन्द्र कोड़ा करता है ।।३४४॥ उत्तर-पूर्व (ऐशान) दिशामें १ नलिना, २ नलिनगुल्मा, ३ कुमुदा और ४ कुमुदप्रभा ये चार वापिकाएँ हैं। इनमें भवन आदिकी समस्त रचना पूर्ववत् जाननी चाहिए। जिस प्रकार नन्दन वनमें इन सबकी रचना है उसी प्रकार सौमनस वन में भी जानना चाहिए ॥३४५-३४६॥ पाण्डुक वनको उत्तर-पूर्वादि दिशाओं में क्रमसे १ पाण्डुक, २ पाण्डुकम्बला, ३ रक्ता और ४ रक्तकम्बला ये चार शिलाएँ हैं । ये शिलाएं विदिशाओं में हैं तथा क्रमसे सुवर्णमयी, रजतमयी, सन्तप्त स्वर्णमयी और लोहिताक्ष मणिमयी हैं। एवं इनका अर्धचन्द्रके समान आकार है ॥३४७-३४८।। ये शिलाएं आठ योजन ऊंची, सौ योजन लम्बी और पचास योजन चौड़ी हैं तथा इनपर जम्बू द्वीपमें उत्पन्न हुए तीर्थंकरोंका अभिषेक होता है ।।३४९।। इनमें रक्ता और पाण्डुक शिलाको लम्बाई दक्षिणोत्तर दिशामें है तथा रक्ता और रक्तकम्बलाकी लम्बाई पूर्व-पश्चिम दिशामें है ।।३५०।। उन शिलाओंपर रत्नमयी तीन-तीन सिंहासन हैं जो पांच सौ धनुष ऊँचे तथा उतने ही चौड़े हैं ॥३५१॥ तीन सिंहासनोंमें दक्षिण सिंहासन सौधर्मेन्द्रका, उत्तर सिंहासन ऐशानेन्द्रका तथा मध्य स्थित सिंहासन जिनेन्द्र देवका है। इन सब सिंहासनोंका मुख पूर्व दिशाको ओर होता है। भावार्थ-मध्यके सिंहासनपर श्री जिनेन्द्र देव विराजमान होते हैं और दक्षिण तथा उत्तरके सिंहासनोंपर क्रमसे सौधर्मेन्द्र और ऐशानेन्द्र खड़े होकर उनका अभिषेक करते हैं ॥३५२।। उन पाण्डुक आदि शिलाओंके सिंहासनोंपर क्रमसे भरत, पश्चिम विदेह, ऐरावत और पूर्व विदेह क्षेत्रमें १. ईसाण दिसाभागे भरह जिणिदाण दिव्वदेहाणं । पंडुक सिलातले तह जम्मण महिमा समुद्दिवा ॥१४८॥ अवर विदेहाण तहा वरपंडुयकंबलम्मि धूमदिसे । वररत्तकंबलम्मि दुणेरदि एरावदाणं तु ॥१४९।। वाऊदिसे रत्तसिला पुन्वविदेहाण जिणवरिंदाणं । जम्मण महिमा मेरुप्पदाहिणेणं तु गंतुणं ॥१५०।। ज. प्र. ४ उद्देश्य । * नैऋत्य और आग्नेय दिशाको आठ वापिकाओंमें सौधर्म तथा वायव्य और ऐशान दिशाकी वापिकाओंमें ऐशानेन्द्र के भवन है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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