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________________ हरिवंशपुराणे गङ्गा सिन्धुश्च रोह्या च रोहितास्या हरित् सरित् । हरिकान्ता च सीता च सीतोदापि च नामतः ॥१२३॥ नारी च नरकान्ता च तथैव परिवर्णिता । सुवर्णकूलया साकं रूप्यकूला परापगा ॥१२४॥ रक्तया सह रक्तोदा ताश्च सर्वा यथायथम् । नदीबहुसहस्रेस्तु भवन्ति सहिताः क्षितौ ॥१२५।। सहस्रयोजनायामः पद्मः पञ्चशतानि च । योजनानि स विस्तीर्णौ दश स्यादवगाहतः ॥१२६॥ हिमवद्वेदिकातुल्या परिक्षिपति वेदिका । समन्ततस्तमापूर्ण शुभशीतलवारिणा ॥१२७॥ योजनाद्धतेविष्कम्भं पुष्करं पुष्करेऽम्मसः । निष्क्रम्य योजनाधं तु काशते क्रोशकर्णिकम् ॥१२८॥ द्विगणद्विगणायामविष्कम्भादौ हदान्तरे । दक्षिणोत्तरमागस्थे पुष्कराणि चकासते ॥१२९॥ पुष्करेषु वसन्त्युच्चैः प्रासादेषु यथाक्रमम् । श्रीहियौ तिकीत्यौं च बुद्धिलक्ष्म्यौ च देवताः ॥१३०॥ ताश्च पल्योपमायुष्काः सौधर्मेन्द्रस्य दक्षिणाः । ऐशानस्योत्तरा देव्यः ससामानिकसंसदः ॥१३१॥ गङ्गा पूर्वेण पद्मस्य द्वारेणानुनगं गता । सिन्धुरप्यपरेणास्य रोहितास्योत्तरेण तु ॥३२॥ महापद्महदाद् रोह्या हरिकान्ता च निःसृता । हरिता सह सीतोदा तिगिन्छहदतस्तथा ॥१३३॥ केशरीहृदतः सीता नरकान्ता च निर्गता । नारी च रूप्यकूला च सा महापुण्डरीकतः ॥१३४॥ सुवर्णकलया रक्ता रक्तोदा पुण्डरीकतः । द्वारेण तोरणोद्भासा विनिःक्रान्ता महानदी ॥१३५॥ षड़ योजनानि गव्यूतं व्यासो वज्रमुखस्य सः । अवगाहोऽर्द्धगव्यूतं गङ्गाया निर्गमे स्मृतम् ॥१३६॥ योजनानि नवोद्विद्धमष्टांशत्रितयं तथा । तोरणं तत्र विज्ञेयं विचित्रमणिभास्वरम् ॥१३७॥ सागरमें प्रवेश करती हैं और सात पश्चिम सागरमें ॥१२२।। उन नदियोंके नाम इस प्रकार हैं१ गंगा, २ सिन्धु, ३ रोह्या (रोहित् ), ४ रोहितास्या, ५ हरित्, ६ हरिकान्ता, ७ सीता, ८ सीतोदा, ९ नारी, १० नरकान्ता, ११ सुवर्णकूला, १२ रूप्यकूला, १३ रक्ता और १४ रक्तोदा। ये सब नदियां पृथिवीतलपर हजारों सहायक नदियोंसे युक्त हैं ॥१२३-१२५॥ पद्म सरोवर एक हजार योजन लम्बा, पांच सौ योजन चौड़ा और दश योजन गहरा है ॥१२६।। शुभ एवं शीतल जलसे भरे हुए इस सरोवरको हिमवत्कुलाचलको वेदिकाके तुल्य एक वेदिका चारों ओरसे घेरे हुए है ॥१२७॥ इस पद्म सरोवरमें एक योजन विस्तारवाला कमल है। यह कमल पानीसे निकलकर आधा योजन ऊपर उठा हुआ है, तथा एक कोशकी उसकी कर्णिका सुशोभित है ॥१२८॥ दक्षिण तथा उत्तर भागमें जो अन्य सरोवर हैं उनको लम्बाई-चौड़ाई आदि पूर्व-पूर्वके सरोवरोंसे दुगुनीदुगुनी है तथा उन सब सरोवरोंमें कमल सुशोभित हैं ॥१२९।। कमलोंपर जो ऊँचे-ऊंचे भवन बने हुए हैं उनमें यथाक्रमसे श्री, हो, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नामकी देवियां निवास करती हैं ॥१३०|| ये सब देवियां एक पल्यकी आयुवाली हैं। इनमें दक्षिण भागको देवियाँ सौधर्मेन्द्रको और उत्तर भागको देवियाँ ऐशानेन्द्रको आज्ञाकारिणी हैं। ये सब सामानिक देवोंको सभासे सहित हैं ।।१३१॥ पद्म सरोवरके पूर्व द्वारसे गंगा, पश्चिम द्वारसे सिन्धु और उत्तर द्वारसे रोहितास्या नदी निकली है। ये नदियाँ सरोवरसे निकलकर कुछ दूर तक पर्वतपर हो बहती हैं ॥१३२।। महापद्मसरोवरसे रोह्या और हरिकान्ता, तिगिछसे हरित् और सीतोदा, केशरी सरोवरसे सीता और नरकान्ता, महापुण्डरीक सरोवरसे नारी और रूप्यकूला और पुण्डरीक सरोवरसे सुवर्णकूला, रक्ता और रक्तोदा नदी निकली हैं । इन नदियोंके निकलनेके द्वार तोरणोंसे सुशोभित हैं ॥१३३-१३५॥ जिस वज्रमुख द्वारसे गंगा निकलती है उसका विस्तार छह योजन और एक कोश है तथा उसको गहराई आधे कोशकी है ॥१३६।। उस द्वारपर चित्र-विचित्र मणियोंसे देदीप्यमान एक तोरण बना हुआ है जो नौ योजन तथा एक योजनके आठ भागोंमें १. रोहिच्च ख., म. । २. योजनोच्छ्रित-म, । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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