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________________ हरिवंशपुराणे त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि विदेहस्य च षट्शती । तथा चतुरशीतिश्च विस्तारश्च तुरंशकाः ॥९॥ ज्या स्याच्छतसहस्राणि योजनानि प्रमाणन: । जम्बूद्वीपप्रमाणेन कृतस्पर्दैन साम्यतः ॥१२॥ अष्टापञ्चाशदिष्टानि सहस्राणि शतं धनः । त्रयोदर्शकलमांशाः साधिकाधन षोडश ॥१३॥ पञ्चाशञ्च सहस्राणि योजनानीषुरिष्यते । महतो धनुषस्तस्य महती युज्यते हि सा ॥९॥ द्वे सहस्त्रे शतैर्युक्ते नवभिश्चैकविंशतिः । साधिकाष्टादशांशाश्व विदेहार्द्धस्य चूलिका ॥१५॥ त्र्यशीतिश्च शतान्यष्टौ सहस्राणीहि षोडश । त्रयोदशांशकाः पादः साधिकश्च मुजाद्वयम् ॥९६॥ प्रमाणं दक्षिणाद्धे यद् द्वीपस्य प्रतिपादितम् । बोध्यं तदुत्तरार्धेऽपि क्षेत्रपर्वतगोचरम् ॥१७॥ ज्यायां ज्यायां विशुद्धायां शेषाद्धं चूलिका स्मृता । चापे चापे विशुद्धेऽर्द्ध तथा पार्श्वभुजा हि सा ॥९॥ वडयमयनीलस्य सिदधायतननामकम् । नीलकूटं च तत्पूर्वविदेहाद्यपरिस्थितम् ॥१९॥ सीताकूटं चतुर्थ स्यात्कीर्तिकूटं च पञ्चमम् । नरकान्तादिकं षष्ठं ततोऽपरविदेहकम् ॥१०॥ रम्यकायष्टमं कूटमपदशनकं विह । उच्छ्रायमूलमध्यान्तविष्कम्मो निषधेषु यः ॥१०॥ रौक्मस्य रुक्मिणोऽप्यने सिद्धायतनमादितः । रुक्मिकूटं द्वितीयं स्यात् तृतीयं रम्यकादिकम् ॥१०२।।. नारीकूटं तुरीयं तु बुद्धिकूटं तु पञ्चमम् । रूप्यकूटं परं कूटं हैरण्यवतपूर्वकम् ॥१०॥ मणिकाञ्चन कुटं च सामान्योच्छायतस्तु ते । मूलमध्यानविस्तारैर्महाहिमवति स्थितः ॥१०॥ कूटान्य कादशैवाने हैमस्य शिखरिश्रुतेः । सिद्धायतनमायं स्यात् कूटं शिखरिपूर्वकम् ॥१०५॥ हैरण्यवतकूटं च सुरदेवीपुरःसरम् । रक्तालक्ष्मीसुवर्णादिकूटानि च यथाक्रमम् ॥१०६॥ तथा रक्तवतो कूटं गन्धदेव्यास्ततः परम् । तथैरावतकूटं च पाश्चात्यं मणिकाञ्चनम् ॥१०७॥ इसके आगे विदेह क्षेत्र है इसका विस्तार तैंतीस हजार छह सौ चौरासी योजन तथा एक योजनके उन्नीस भागोंमें चार भाग प्रमाण है ॥९१॥ इसकी प्रत्यंचाका प्रमाण मानो समानताके कारण स्पर्धा करनेवाले जम्बू द्वीपके बराबर एक लाख योजन है ॥९२।। इसके धनुःपृष्ठका विस्तार एक लाख अंठावन हजार एक सौ तेरह योजन तथा कुछ अधिक साढ़े सोलह कला है ॥१३॥ बाणका विस्तार पचास हजार योजन है सो ठीक ही है क्योंकि उतने बड़े धनुषका उतना बड़ा बाण होना उचित ही है ।।१४।। विदेहाधंकी चूलिका दो हजार नौ सौ इक्कीस योजन तथा कुछ अधिक अठारह कला है ॥९५।। इसकी दोनों भुजाओंका विस्तार सोलह हजार आठ सौ तिरासी योजन तथा सवा तेरह कलासे कुछ अधिक है ॥९६।। जम्बू द्वीपके दक्षिणार्ध भागमें क्षेत्र तथा पर्वत आदिका जो प्रमाण बतलाया है वही उत्तरार्ध भागमें भी जानना चाहिए ।।९७॥ प्रत्यंचा, धनु:पृष्ठ, बाण, भुजा तथा चूलिकाका जो विस्तार दक्षिणार्धमें बतलाया गया है वही शेषार्धमें भी है ।।१८।। उत्तरार्धके पर्वतोंमें जो विशेषता है उसे बतलाते हैं-विदेह क्षेत्रके आगे जो वैडूर्यमणिमय नील पर्वत है उसके ऊपर निम्नलिखित नौ कूट हैं-१ सिद्धायतन कूट, २ नील कूट, ३ पूर्व विदेह कूट, ४ सीताकूट, ५ कोर्ति कूट, ६ नरकान्तककूट, ७ अपर विदेह कूट, ८ रम्यक कूट और ९ अपदर्शन कूट । इन सब कूटोंको ऊँचाई तथा मूल मध्य और ऊध्वं भागकी चौड़ाई निषधाचलके कूटोंके समान है ॥९९-१०१।। रुक्मी पर्वत चाँदीका है उसके अग्रभागपर निम्नलिखित आठ कूट हैं-पहला सिद्धायतन कूट, दूसरा रुक्मि कूट, तीसरा रम्यक कूट, चौथा नारी कुट, पांचवां बुद्धि कूट, छठा रूप्य कूट, सातवाँ हैरण्यवत कूट और आठवाँ मणिकांचनकूट। इन सबकी सामान्य ऊंचाई मूल मध्य तथा अग्र भागका विस्तार महाहिमवान् पर्वतके कूटोंके समान जानना चाहिए ॥१०२-१०४॥ शिखरी पर्वत सुवर्णमय है उसके अग्रभागपर निम्नलिखित ग्यारह कूट हैं-१ सिद्धायतन कूट,२ शिखरो कूट, ३ हैरण्यवत कूट, ४ सुरदेवी कूट, ५ खत्ता कूट, ६ लक्ष्मी कूट, ७ सुवर्ण कूट, १. महिती म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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