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________________ कारिका ६५ ] देवागम करनेपर एक समवायकी मान्यता बाधित ठहरेगी और अनवस्थादोषका प्रसंग भी उपस्थित होगा । ) ५९ ( यदि यह कहा जाय कि समवाय अनाश्रित होनेसे सम्बन्धान्तरकी अपेक्षा नहीं रखता, किन्तु असम्बद्ध ही रहता है, तो यह कहना उचित नहीं; क्योंकि ) जो स्वयं असम्बद्ध ( सम्बन्ध रहित ) है वह एक ( अवयवो ) का दूसरे ( अवयवों ) के साथ सम्बन्ध कैसे करा सकता है ? सम्बन्ध रहित होनेकी हालत में वह दूसरे ( द्रव्यादि ) के साथ कैसे रह सकता है ? नहीं रह सकता ।' सामान्यं समवायश्चाऽप्येकैकत्र समाप्तितः । अन्तरेणाऽऽश्रयं न स्यान्नाशोत्पादिषु को विधिः ॥ ६५ ॥ 'जिस प्रकार सामान्य आश्रयके बिना नहीं रहता, उसी प्रकार समवाय भी आश्रयके बिना नहीं रहता । जब सामान्य और समवाय दोनों की प्रत्येक द्रव्यादि नित्य व्यक्तियोंमें समाप्ति - पूर्णता होती है तब नाश हुए तथा उत्पन्न हुए अनित्य कार्योंमें उनके सद्भावको विधि-व्यवस्था कैसे बन सकती है ? - नहीं बन सकती ।' व्याख्या - जहाँ एक व्यक्तिका उत्पाद हुआ वहाँ पहलेसे न सामान्य है और न समवाय; क्योंकि उनका वहाँ कोई आश्रय नहीं है और ये दोनों बिना आश्रयके नहीं रहते । अन्यथा अनाश्रित होनेका प्रसंग आयेगा । यह भी सम्भव नहीं कि वे अन्य व्यक्ति से पूर्णरूपमें या अंशरूप में आते हैं; क्योंकि पूर्वाधारका अभाव तथा सामान्य एवं समवाय में सांशपनेका प्रसंग आवेगा । स्वयं पीछे उनका उत्पाद भी सम्भव नहीं है, अन्यथा वे अनित्य माने जायेंगे । आश्रयके नाश होनेपर भी उनका नाश नहीं होता; क्योंकि वे नित्य हैं और आश्चर्य यह कि प्रत्येकमें पूर्ण रूपसे रहते हैं । सारांश यह कि सामान्य और समवाय इन दोनों For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International 1
SR No.001170
Book TitleAptamimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages190
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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