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________________ २४ महापच्चक्खाणपइण्णय जाहे होइ पमत्तो जिणवरवयणरहिओ अणाउत्तो। ताहे इंदियचोरा करिति तव-संजमविलोमं ।। ९८॥ ( संवरमाहप्पं ) जिणवयणमणुगयमई जं वेलं होइ संवरपविट्ठो । अग्गी व वाउसहिओ समूलडालं डहइ कम्मं ।। ९९ ॥ जह डहइ वाउसहिओ अग्गी रुक्खे वि हरियवणसंडे । तह पुरिसकारसहिओ नाणी कम्मं खयं णेई ॥१०॥ (नाणपाहण्णपरूवणा) जं अन्नाणी कम्म खवेइ बहयाहि वासकोडीहिं। तं नाणी तिहिं गुत्तो खवेइ ऊसासमित्तेणं ॥१०॥ न हु मरणम्मि उवग्गे सक्का बारसविहो सुयक्खंधो। सव्वो अणुचिंतेउं धंतं पि समत्थचित्तेणं ।।१०२॥ एक्कम्मि वि जम्मि पए संवेगं कुणइ वीयरायमए । तं तस्स होइ नाणं जेण विरागत्तणमुवेइ ॥१०३॥ एक्कम्मि वि जम्मि पए संवेगं कुणइ वीयरायमए। सो तेण मोहजालं छिदइ अज्झप्पयोगेणं ॥१०४॥ एक्कम्मि वि जम्मि पए संवेगं कुणइ वीयरायमए । वच्चइ नरो अभिक्खं तं मरणं तेण मरियव्वं ।।१०५॥ जेण विरागो जायइ तं तं सव्वायरेण कायव्वं । मुच्चइ हु ससंवेगी, अणंतओ होअसंवेगो ॥१०६।। १. धणियं पि सा०॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001140
Book TitleAgam 26 Prakirnak 03 Maha Pratyakhyan Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay, Suresh Sisodiya, Sagarmal Jain
PublisherAgam Ahimsa Samta Evam Prakrit Samsthan
Publication Year1991
Total Pages115
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_mahapratyakhyan
File Size6 MB
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